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जेएनयू मामलाः मोदी सरकार की पसंद नहीं थे कुलपति प्रो. एम. जगदीश कुमार

Sun, 12 Jan 2020 06:21 AM IST
संजीव कुमार झा सीमा शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • कुलपति पद के लिए 2016 में भेजे गए चार नामों में से राष्ट्रपति ने सबसे नीचे वाले को चुना
  • वैज्ञानिक प्रो. वीएस चौहान थे एचआरडी मंत्रालय की पहली पसंद
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जेएनयू वीसी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जेएनयू में 76 दिन से चल रहे विवाद के केंद्र में आए कुलपति प्रो. एम. जगदीश कुमार मोदी सरकार की पसंद नहीं थे। सरकार उन्हें जेएनयू वीसी बनाने के पक्ष में नहीं थी। वर्ष 2016 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री स्मृति ईरानी ने जो चार नामों का पैनल राष्ट्रपति के पास भेजा था, उसमें प्रो. कुमार का नाम सबसे नीचे था।

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स्मृति वैज्ञानिक प्रो. वीएस चौहान को जेएनयू कुलपति की जिम्मेदारी देना चाहती थीं। उनके पास विश्वविद्यालय संभालने का अच्छा अनुभव था। विश्वविद्यालयों के विजिटर और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंत्रालय की सिफारिश को दरकिनार कर आईआईटी के प्रो. एम. जगदीश कुमार को जेएनयू कुलपति बना दिया।

एचआरडी मंत्रालय के 2016 में गए चार नामों के पैनल में सबसे ऊपर वैज्ञानिक वीएस चौहान, उनके बाद जेएनयू के ही दो प्रोफेसर प्रो. आरएनके बमजेई और प्रो. रामाकृष्णन रामास्वामी और सबसे नीचे प्रो. एम. जगदीश कुमार का नाम था। कुलपति बनने से पहले और बाद में भी प्रो. एम जगदीश मंत्रालय की पसंद नहीं रहे थे।
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स्मृति जानती थीं कि आईआईटी के प्रोफेसर होने के नाते प्रो. एम. जगदीश कुमार को जेएनयू जैसे उच्च शिक्षण संस्थान के मुखिया की जिम्मेदारी सौंपना ठीक नहीं होगा। वे जेएनयू की संस्कृति और कामकाज में फिट नहीं होंगे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के फैसले पर मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि उनका फैसला सामान्य था। चयन समिति द्वारा भेजे गए पैनल में से किसे कुलपति बनाना है, इसका अधिकार राष्ट्रपति यानी विश्वविद्यालयों के विजिटर के पास होता है।

तत्कालीन संयुक्त सचिव ने जताई थी आशंका

तत्कालीन संयुक्त सचिव एसएस संधु ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को इस मुद्दे पर एक नोट भेजकर आशंका जताई थी। उन्होंने लिखा था कि पैनल में चार नाम हैं। प्रो. एम. जगदीश कुमार आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ाते हैं। आईआईटी और जेएनयू की संस्कृति व माहौल बिल्कुल अलग हैं।

मूल रूप से यहां की संस्कृति, ढांचा व कामकाज बिल्कुल अलग हैं। प्रो. वीएस चौहान के पास विश्वविद्यालयों को संभालने का अनुभव है। ऐसे में वे जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं।

जेएनयू को आगे बढ़ाने के लिए सख्त फैसले

जेएनयू कुलपति बनने के बाद प्रो. कुमार ने मंत्रालय से सदैव दूरी बनाकर रखी। वे मंत्रालय के किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं होते थे। कुलपति बनने के बाद बेशक छात्र व शिक्षक समुदाय उनसे नाराज रहा, लेकिन विश्वविद्यालय को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कई सख्त फैसले लिये।

इसमें इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, सिक्योरिटी व डिजास्टर प्रोग्राम के स्पेशल सेंटर शुरू कराना मुख्य रहे। इसके अलावा, शोध कार्यों के चलते राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में लगातार सुधार हो रहा है। वहीं, शिक्षक संघ की नाराजगी के बाद भी एचआरडी, यूजीसी व जेएनयू का एमओयू साइन कराना भी इनमें शामिल है। प्रो. कुमार का नाम कभी भ्रष्टाचार से नहीं जुड़ा।
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देशविरोधी नारों का था पहला विवाद

प्रो. कुमार के कुलपति बनने के कुछ दिन बाद ही फरवरी 2016 में जेएनयू कैंपस में देशविरोधी और देश के टुकड़े करने की मंशा वाले नारे लगे। आतंकी अफजल गुरु की बरसी पर हुए कार्यक्रम में कन्हैया कुमार समेत कई छात्रों के नारे लगाते वीडियो सामने आए थे।

देशविरोधी और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह’ जैसे नारों के बाद देशभर में बवाल खड़ा हो गया। इसके अलावा, कैंपस से नजीब अहमद के गायब होने और फिर हॉस्टल फीस बढ़ोतरी का विवाद उनसे जुड़ गया।
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