तत्कालीन संयुक्त सचिव एसएस संधु ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को इस मुद्दे पर एक नोट भेजकर आशंका जताई थी। उन्होंने लिखा था कि पैनल में चार नाम हैं। प्रो. एम. जगदीश कुमार आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ाते हैं। आईआईटी और जेएनयू की संस्कृति व माहौल बिल्कुल अलग हैं।
मूल रूप से यहां की संस्कृति, ढांचा व कामकाज बिल्कुल अलग हैं। प्रो. वीएस चौहान के पास विश्वविद्यालयों को संभालने का अनुभव है। ऐसे में वे जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं।
जेएनयू कुलपति बनने के बाद प्रो. कुमार ने मंत्रालय से सदैव दूरी बनाकर रखी। वे मंत्रालय के किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं होते थे। कुलपति बनने के बाद बेशक छात्र व शिक्षक समुदाय उनसे नाराज रहा, लेकिन विश्वविद्यालय को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कई सख्त फैसले लिये।
इसमें इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, सिक्योरिटी व डिजास्टर प्रोग्राम के स्पेशल सेंटर शुरू कराना मुख्य रहे। इसके अलावा, शोध कार्यों के चलते राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में लगातार सुधार हो रहा है। वहीं, शिक्षक संघ की नाराजगी के बाद भी एचआरडी, यूजीसी व जेएनयू का एमओयू साइन कराना भी इनमें शामिल है। प्रो. कुमार का नाम कभी भ्रष्टाचार से नहीं जुड़ा।
प्रो. कुमार के कुलपति बनने के कुछ दिन बाद ही फरवरी 2016 में जेएनयू कैंपस में देशविरोधी और देश के टुकड़े करने की मंशा वाले नारे लगे। आतंकी अफजल गुरु की बरसी पर हुए कार्यक्रम में कन्हैया कुमार समेत कई छात्रों के नारे लगाते वीडियो सामने आए थे।
देशविरोधी और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह’ जैसे नारों के बाद देशभर में बवाल खड़ा हो गया। इसके अलावा, कैंपस से नजीब अहमद के गायब होने और फिर हॉस्टल फीस बढ़ोतरी का विवाद उनसे जुड़ गया।