जेसिका लाल के परिजनों ने मनु शर्मा की रिहाई का विरोध नहीं किया। मनु शर्मा को छोड़ने के लिए पांच बार पहले भी अपील की गई थी लेकिन हर बार उसकी अपील को खारिज कर दी गई थी। इस बार अपील आने से पहले तिहाड़ जेल प्रशासन, दिल्ली पुलिस और जेसिका लाल के परिजनों ने मनु शर्मा को जेल से छोड़ने में कोई आपत्ति नहीं जताई थी। इस आधार पर जेल प्रशासन ने प्रस्ताव रिव्यू कमेटी को भेजा था।
जेल में होने वाली खेलकूद प्रतियोगिता से लेकर हर गतिविधि में मनु शर्मा शामिल होता था। मनु कैदियों द्वारा जेल में निकाले जाने वाली मासिक पत्रिका का संपादन भी करता था। वह जेल में तैयार होने वाले सामान को बनाने वाले कैदियों की देखरेख भी करता था। इसके अलावा वह जेल में कैदियों को कानूनी सहायता भी उपलब्ध करवाता था।
मनु की खास बात यह थी कि वह जेल की खेलकूद प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था। खेल में उसकी खास दिलचस्पी थी। उसने जब जेसिका को गोली मारी थी उसकी उम्र महज 22 साल की थी। फिलहाल उसकी उम्र 43 साल है।
तिहाड़ जेल में मनु का आचरण ठीक था। उसके अच्छे आचरण के लिए उसे तिहाड़ के सेमी ओपन जेल में रखा गया था। जहां रहने के दौरान उसके अच्छे व्यवहार को देखते हुए उसे ओपन जेल में रखा गया। सेमी ओपन जेल में कैदियों को तिहाड़ परिसर में कहीं भी घूमने की अनुमति होती है। वहीं ओपन जेल में रहने वाले कैदी दिन भर तिहाड़ से बाहर निकलकर अपना काम कर सकते हैं और फिर रात में जेल वापस आ सकते हैं। पिछले एक साल से मनु शर्मा ओपन जेल में ही रह रहा था।
क्या था मामला
सोशलाइट बीना रमानी ने महरौली में नए खुले टैमरिंड कोर्ट रेस्तरां में थर्सडे स्पेशल नाइटस का 29 अप्रैल 1999 को आयोजन किया था। रेस्तरां को शराब का लाइसेंस प्राप्त करना था, लेकिन कूपन से ड्रिंक खरीद सकते थे। उस रात मॉडल जेसिका लाल, बीना रमानी की बेटी मालिनी रमानी, दोस्त शायन मुंशी और कई दोस्त बार में ड्रिंक परोस रहे थे। इस पार्टी में मनु शर्मा, उसके दोस्त व परिचित पहुंचे। रात लगभग दो बजे मनु शर्मा ने जेसिका से शराब की मांग की लेकिन उसने मना कर दिया। इसी दौरान चलाई गई एक गोली जेसिका लाल की कनपटी में लग गई। अपोलो अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया।
इस मामले में निचली अदालत ने फरवरी 2006 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। वहीं इस आदेश को पलटते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसंबर 2006 में मनु शर्मा को फांसी की सजा सुनाई। हालांकि वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे उम्र कैद में बदल दिया था। मनु शर्मा ने जेल में 14 साल की सजा पूरी करने के बाद रिव्यू बोर्ड में अपील की थी।