एक महीने के भीतर दिल्ली भाजपा का दूसरा मजबूत स्तंभ गिर गया है। सुषमा स्वराज के बाद दिल्ली भाजपा ने अरुण जेटली के रूप में अपना खेवनहार खो दिया। केंद्र के साथ दोनों वरिष्ठ भाजपा नेताओं की दिल्ली की राजनीति में भी अहम भूमिका रहती थी। इनकी सहमति के बिना दिल्ली भाजपा कोई भी फैसला नहीं लेती थी। दिलचस्प यह है कि छात्र नेता रहे जेटली का दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव में भी दखल रहता था।
अरुण जेटली दिल्ली भाजपा युवा मोर्चा के पहले अध्यक्ष रह चुके थे। उनके साथ काम करने वाले व युवा मोर्चा मंत्री पद पर जेटली के साथ काम करने वाले धर्मवीर शर्मा ने बताया कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी अरुण जेटली का दिल्ली की राजनीति से काफी लगाव था।
डीयू के छात्र राजनीति से लेकर भाजपा में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हुए राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे जेटली दिल्ली की सियासी नब्ज को बखूबी समझते थे। प्रदेश भाजपा में उनकी राय व पसंद मायने रखता था। दिल्ली की राजनीति में दिलचस्पी के कारण कार्यकर्ताओं से भी उनका विशेष लगाव रहता था।
समय के साथ उनका राजनीतिक कद जरूर बढ़ा पर दिल्ली की राजनीति के केंद्र में अरुण जेटली बराबर बने रहे। दिल्ली भाजपा की राजनीति भाजपा के तीन कद्दावर केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर रहती थी। अरुण जेटली की सुषमा स्वराज और लालकृष्ण आडवाणी के साथ दिल्ली की सियासत में भी अहम भूमिका रही। तीनों के निर्देश पर भाजपा चुनावी रणनीति तैयार करती थी।
इतना हीं नहीं दिल्ली में छोटे से बड़े चुनाव का भी चुनावी घोषण पत्र बनाने में भी जेटली विशेष रुचि लेते थे। पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना के मुख्यधारा की राजनीति से हटने के बाद दिल्ली की कमान जेटली व सुषमा स्वराज ही संभालते थे।