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पढ़ें 2013 का वो किस्सा जब कोई नहीं था मोदी के साथ, और जेटली ने थामा था हाथ

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अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की उपस्थिति को धार देने वाले अरुण जेटली नहीं रहे। 24 अगस्त को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लंबी बीमारी से जूझ रहे अरुण जेटली के निधन की खबर आई...देश के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। अरुण जेटली जैसे कुशल नेता का चले जाना पूरे भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ राष्ट्र के लिए भी बड़ी क्षति है। 

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एक तरफ जहां देश ने बेहतरीन राजनेता खोया वहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना एक अनन्य सहयोगी भी खो दिया। भारतीय जनता पार्टी के लिए तो यह दुखद घटना अपूर्णीय क्षति के समान है ही, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के लिए जेटली का निधन उनके दायां हाथ कट जाने की पीड़ा से कम नहीं है। देश के कई वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी की तलवार को धार देने वाले सहयोगी नेताओं में अमित शाह और राजनाथ सिंह से भी पहले अरुण जेटली का नाम आता है। जेटली उस समय भी मोदी के साथ अडिग खड़े रहे, जब पार्टी के अधिकतर वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ थे। 

बात 9 जून 2013 की है, जब गोवा में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया था। उस दौरान नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, लेकिन राज्य में हुए दंगों के बाद देश भर में चर्चित चेहरा बन चुके थे। अधिवेशन में भाजपा संसदीय समिति ने नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष चुना था। समीति के इस फैसले से मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता नाराज थे।

 

आडवाणी ने तो गुस्से में आकर पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया था। तब अरुण जेटली और राजनाथ सिंह प्रचार समिति अध्यक्ष के एलान के पहले अंतिम घड़ी तक सभी नेताओं को मनाने में जुटे रहे। उन्होंने ही सभी नेताओं को इस बात के लिए मनाया कि मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। हालांकि आडवाणी को मनाने में वे असफल रहे थे।

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जिस दिन प्रचार समिति के अध्यक्ष का एलान हुआ, उसी दिन दोपहर होते-होते गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का अंतिम संदेश साफ हो चुका था कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम का एलान अब सिर्फ एक औपचारिकता है। यानी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए नरेंद्र मोदी का नाम तय माना जा रहा था।

13 सितंबर, 2013 को भाजपा ने 2014 लोकसभा चुनावों के लिए अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम का औपरचारिक एलान कर दिया। इसके बाद एक बार फिर आडवाणी जी का गुस्सा फूट पड़ा था। वो इस फैसले के सख्त खिलाफ थे। साथ ही इसमें सुषमा स्वराज की भी मौन सहमति थी। इतना ही नहीं, वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल की बहुचर्चित महिला नेता और उनकी अनन्य समर्थक समृति ईरानी भी उन दिनों गुजरात में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर बैठ गई थीं।
 
देशभर में नरेंद्र मोदी के खिलाफ इतना सब कुछ एक साथ चल रहा था, लेकिन अरुण जेटली बिना डगमगाए साथ खड़े थे। वो पहले शख्स थे जिन्होंने सितंबर महाधिवेशन के दौरान सामने आकर कहा था कि नरेंद्र मोदी को संगठन की तरफ से प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए। बाद में राजनाथ सिंह और अन्य नेताओं ने उनका समर्थन किया।
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2014 के लोकसभा चुनावों में अमृतसर लोकसभा सीट से हार जाने के बाद अरुण जेटली को राज्यसभा भेजा गया और इसके बाद उन्हें देश का वित्त मंत्री बनाया गया। इसी फैसले से देश को पता चल गया कि भाजपा शासन में जेटली की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय राजनीति में तो अरुण जेटली नरेंद्र मोदी के पथ प्रदर्शक थे ही, लेकिन मोदी को उनका साथ 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद से ही मिल गया था। जेटली कदम-कदम पर मोदी-शाह का समर्थन करते रहे। उन्होंने राजनीति के अलावा कानूनी मामलों में भी मोदी को रास्ता दिखाने का काम किया था। वो मोदी के एक ऐसे सहयोगी थे, जिन्हें मोदी खुद भी अपना मार्गदर्शक मानते हैं। मोदी की राजनीति में अरुण जेटली की जो हैसियत थी उसी से उनके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

जेटली का जाना प्रधानमंत्री मोदी के लिए बिल्कुल वैसा ही है, जैसे सेनापति के बिना युद्ध के मैदान में राजा। भविष्य में जब भी जेटली और मोदी की चर्चा होगी, तो इतिहास भी यही कहेगा कि '24 अगस्त की दोपहरी में मोदी को मोदी बनाने वाले 'अरुण' का अस्त हो गया...'
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