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दिल्ली विधानसभा चुनावः बात सिर्फ 'प्रतिष्ठा' की है, इसलिए पार्टियों ने झोंकी पूरी ताकत

Sat, 08 Feb 2020 05:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा आशीष तिवारी, नई दिल्ली
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दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली का चुनाव महज प्रतिष्ठा का ही चुनाव है, क्योंकि दिल्ली के चुनाव से निकले जनादेश में ऐसी कोई राजनैतिक पिच नहीं बनाई जा सकती जिससे देश के अन्य राज्यों में उस पर बैटिंग की जा सके। चूंकि मामला प्रतिष्ठा से जुड़ा है बस इसीलिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी। 

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प्रतिष्ठा बचानें को आम आदमी पार्टी ने भी इस बार जितना संभल कर प्रचार प्रसार किया वह बताता है कि दिल्ली उनके लिए भी कितनी अहम है। अरविंद केजरीवाल ने इस चुनाव में जितने सधे हुए तरीके से और विरोधियों पर बहुत कम पलटवार करते हुए दिल्ली की जनता को आगे रखकर बचाव किया वह बताता है केजरीवाल कहीं चूकना नहीं चाहते थे। हालांकि इस दोनों पार्टियों से इतर कांग्रेस के पास इस चुनाव में खोने को तो कुछ है नहीं। इसलिए फ्री होकर कांग्रेस ने भी अपने हिस्से की बैटिंग की। 

दिल्ली के चुनावों में भाजपा के रणनीतिकार रहे और अब गृहमंत्री अमित शाह पहली बार सबसे ज्यादा चुनावी रैली करने वाले नेता बने। उन्होंने जिस तरह से गली गली मोहल्ले मोहल्ले लोगों के दरवाजे पर वोट मांगे। लोगों के घर खाना खाया और लोगों से मिले वह किसी नगर पालिका के चुनावों की याद दिलाता रहा। 
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इतनी मेहनत का मतलब दिल्ली की सत्ता से ज्यादा दिल्ली में सरकार बनाकर अनी प्रतिष्ठा को बचाना है। अब अगर इस चुनाव में भाजपा चुनाव जीत जाती है तो उसके पास तीन इंजन वाली सरकार होगी। जिसमें एमसीडी से लेकर केंद्र की भी सरकार होगी। अगर भाजपा चुनाव हारती है तो भाजपा के वनवास का वक्त 21 साल से बढ़कर 26 साल का हो जाएगा। 

यानी कि सदी के एक चौथाई वक्त से दिल्ली की सत्ता से बाहर रहने वाली पार्टी। चूंकि भाजपा ने इसको प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है इसीलिए पंद्रह हजार सभाओं का लक्ष्य रखकर पूरे समीकरणों और बूथस्तर के कार्यकर्ताओं को साधने की योजना बनाई थी। 
 

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इसी तरह से अगर आम आदमी पार्टी चुनाव जीतती है तो उनका अगला बड़ा लक्ष्य देश की राजनीति के केंद्र में आने का होगा। पिछले चुनावों के बाद आप ने जिस तरह से पंजाब में सक्रिय राजनीति कर अपना कद बढ़ाने की कोशिश की थी, उसी तरह से इस बार वह बिहार और पश्चिम बंगाल की ओर रुख करके अपनी पैठ बनाने की जुगत करेंगे। अगर चुनाव के परिणाम आप के पक्ष में न हुए तो पार्टी का पूरा अस्तित्व ही दांव पर लग जाएगा। 

रही बात कांग्रेस की तो यह बात कांग्रेस के हर छोटे बड़े नेता को पता है कि उनके पास इस चुनाव में कुछ भी खोने को नहीं है। क्योकि पिछले चुनावों में उनकी सीटें शून्य थीं। इसलिए जो भी उनको मिलेगा वह प्लस होगा। वह चाहें वोट प्रतिशत हो या सीटें। दिल्ली के लोगों में यह संदेश है कि कांग्रेस उतनी मजबूती से मैदान में नहीं है जितनी मजबूती से होना चाहिए था। 

हालांकि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी में दिल्ली के चुनावी परिणाम से किसी चेहरे को कोई खास नुकसान नहीं होने वाला, लेकिन कोई बहुत बड़े चेहरे का इस चुनाव से उदय भी नहीं होने वाला है। दिल्ली के चुनाव से राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के कैरियर पर भी कोई खास फर्क नहीं पडने वाला। क्योंकि पार्टी ने उस तरह से ताकत नहीं झोंकी जितनी प्रियंका या राहुल यूपी की घटनाओं में या चुनावों में झोंक देते हैं।
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