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सुप्रीम फैसलाः विरोध-प्रदर्शन के साथ दूसरों की परेशानी का भी ध्यान रखना जरूरी

Thu, 08 Oct 2020 05:28 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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supreme court - फोटो : पीटीआई
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शाहीन बाग में करीब साढ़े तीन महीने चले धरना-प्रदर्शन के कानूनी पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धरना में शामिल हुए लोगों में नाराजगी देखने को मिली। वहीं जिन लोगों को परेशानी उठानी पड़ी वह कोर्ट के निर्णय से बेहद खुश दिखे। उनका कहना है कि लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार हर किसी के पास है, लेकिन अपने अधिकार के लिए दूसरों को परेशानी बढ़ाना गलत है। अहम है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 13 दिसंबर 2019 को छात्रों पर लाठीचार्ज के बाद शाहीन बाग का नाम 15 दिसंबर को देश-दुनिया के सामने आया था। जो लॉकडाउन लागू होने तक जारी रहा। 24 मार्च को पुलिस ने धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों को जबरन हटा दिया था। 

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15 दिसंबर को सीएए-एनआरसी के विरोध में छात्रों के साथ मिलकर शाहीन बाग के लोगों ने सरिता विहार से नोएडा मार्ग पर जमावड़ा लगा दिया। जिससे कालिंदी कुंज से होकर नोएडा से दिल्ली और फरीदाबाद आने-जाने वाले लोगों को महीनों तक परेशानी हुई। वहीं, इस मार्ग के बंद होने के कारण रिंग रोड, मथुरा रोड और डीएनडी पर यातायात का दबाव बढ़ने से लोगों को हर दिन भीषण जाम का सामना करना पड़ रहा था। शाहीन बाग का रास्ता बंद होने से स्थानीय लोगों के अंदर आक्रोश उत्पन्न होने से धरनास्थल के पास वाले रास्ते को माहौल शांत रखने के लिए बंद कर दिया गया था। 

इससे नाराज होकर जनवरी के दूसरे हफ्ते में मदनपुर खादर गांव के खारीकुआं चौपाल पर आसपास के दर्जनभर गांवों की पंचायत बुलाई गई थी। इसमें खिजराबाद, तैमूर नगर, सराय जुलैना, भरत नगर, जसोला, मदनपुर खादर, आली गांव, आली विस्तार, बदरपुर, जैतपुर, मीठापुर, जेजे कॉलोनी समेत आसपास के तमाम गांवों के लोग शामिल हुए थे। इन लोगों ने रास्ता खुलवाने के लिए प्रयास किया तो धरनास्थल का माहौल काफी खराब हो गया। एहतियात के तौर पर प्रशासन ने पुलिस के साथ-साथ मौके पर केंद्रीय बल की तैनाती कर दी।  
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दिल्ली चुनाव में बना था मुख्य मुद्दा
शाहीन बाग धरने के बीच ही 8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के मतदान की तारीख का ऐलान कर दिया गया। चुनाव में लोगों की पानी, बिजली, शिक्षा से बड़ा मुद्दा शाहीन बाग बन गया था। केंद्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के दूसरे नेताओं भी चुनावी रैलियों में शाहीन बाग का जिक्र किया था। दूसरी तरफ सीएम अरविंद केजरीवाल ने पूरे धरने से अपनी दूरी बनाकर रखी, हालांकि उनके विधायक धरने का समर्थन करने पहुंचे थे। 

धरने के खिलाफ पिस्टल तक लहराया
शाहीन बाग में धरने से नाराज कई लोग वहां पिस्टल लेकर लहराने पहुंच गये थे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने भी पूरे धरनास्थल को अपने कब्जे में ले लिया। धरने में शामिल होने के लिए हर किसी को जांच के बाद ही प्रदर्शन में शामिल होने की इजाजत दी जाती।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त तीन वार्ताकार भी पहुंचे थे 
सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी को शाहीन बाग से जुड़े कुछ याचिकाओं पर सुनवाई की। कोर्ट ने पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, वरिष्ठ अधिवक्ता साधना रामचंद्रन और संजय हेगड़े को वार्ताकार नियुक्त कर दिया। रामचंद्रन और संजय हेगड़े 19 फरवरी को प्रदर्शन स्थल पहुंचे और उन्होंने वहां भारी तादाद में जुटे प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़कर सुनाया। दोनों वार्ताकारों ने प्रदर्शनकारियों को समझाकर रास्ते से हटाने का प्रयास किया। वहीं तीसरे वार्ताकार वजाहत हबीबुल्लाह शाहीन बाग नहीं गए। शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों ने वार्ताकारों की बात नहीं मानी और वह अपनी मांग पर अड़े रहे।

अमित शाह से मिलने के लिए पैदल मार्च का प्रयास
सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से पहले प्रदर्शनकारी 16 फरवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के लिए उनके आवास की तरफ बढ़े। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने 15 फरवरी की रात ही शाहीन बाग के उन प्रदर्शनकारियों से लिस्ट मांगी थी कि जो गृहमंत्री से मिलना चाहते हैं। लिस्ट नहीं देने से प्रदर्शनकारियों को गृहमंत्री के पास जाने की इजाजत नहीं दी गई।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दौरे के बीच भी जारी रहा प्रदर्शन
शाहीन बाग की तर्ज पर दिल्ली के अन्य इलाकों में भी सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने मुख्य मार्गों पर धरना शुरू कर दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे से ठीक पहले उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़क गए। 23 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति भारत पहुंचे और अचानक जाफराबाद समेत कई हिस्सों में दंगे शुरू हो गए। तब एक तबके ने इतने लंबे चले धरने के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए दंगे में शाहीन बाग के लोगों का हाथ बताया था। 

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लॉकडाउन का एलान और धरने पर पाबंदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए 23 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन का ऐलान कर दिया। लॉकडाउन लागू होने के बबाद प्रदर्शनकारियों ने धरना खत्म करने में आनाकानी की, लेकिन आखिरकार उन्हें देर रात जबरन बल पूर्वक धरनास्थल से हटा दिया गया। पुलिस ने मामला भी दर्ज किया था।

अनलॉक-1 के बाद प्रदर्शन शुरू करने का हुआ था प्रयास
केंद्र सरकार ने जून में अनलॉक-1 का ऐलान किया तो शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी फिर से धरनास्थल पर जुटने की कोशिश करने लगे थे। कुछ महिलाएं 3 जून को प्रदर्शन स्थल पर पहुंचीं थी। लेकिन पुलिस बलों ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें वहां से हटा दिया। धरनास्थल के पास अभी पुलिस बल तैनात है।

यहां भी शुरू हुआ धरना
सीएए और एनआरसी के विरोध में हौजरानी व निजामुद्दीन बस्ती, तुर्कमानगेट, जामिया सहित अन्य इलाकों में भी धरना शुरू हुआ था। यहां भी प्रदर्शनकारी सड़क पर धरना देना चाहते थे लेकिन पुलिस ने समय रहते उन्हें सड़क से हटा दिया था। हालांकि जामिया के सामने प्रदर्शनकारियों ने साढ़े तीन महीने तक शाहीन बाग की तर्ज पर रास्ते को बंद कर रखा था। यहां ट्रैफिक के लिए केवल एक ही रास्ते को चालू रखा गया था। 

बच्चों का स्कूल जाना बना बड़ा मुद्दा
धरने के कारण, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, सरिता विहार, मदनपुर खादर, आली गांव, जसोला, सुखदेव विहार, कालिंदी कॉलोनी के बच्चे महीनों तक स्कूल नहीं जा पाए थे। नोएडा, ग्रेटर नोएडा से दिल्ली आने वाले लोग आगरा कैनाल से होकर मदनपुर खादर गांव में होते हुए सरिता विहार के लिविंग स्टाइल मॉल के सामने निकलते थे।  

शाहीन बाग का बाजार हुआ चौपट 
धरने के कारण शाहीन बाग में दुकानें करीब चार माह तक बंद रहीं। यहां जूते, कपड़े, स्पोर्ट्स एसेसरीज की दुकानें समेत कई बड़ी कंपनियों के कई शोरूम थे। इससे दुकानदारों को लाखों का घाटा हुआ। लॉकडाउन के बाद 24 मार्च को पुलिस ने धरना हटा दिया लेकिन कुछ दुकानें हमेशा के लिए बंद हो गईं। शाहीन बाग के साथ ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बाहर भी महीनों धरना चला था, जिस कारण सुखदेव विहार, एनएफसी आदि के लोग परेशान रहे थे।

लोगों ने कहा...
- धरने की वजह से हर दिन समय की बर्बादी के साथ-साथ पेट्रोल भी ज्यादा खर्च होता था। आश्रम होकर नोएडा जाने से सफर लंबा हो जाता था।- सुनील कुमार, सरिता विहार निवासी

- बच्चों को साढ़े तीन महीने तक स्कूल जाना बंद करा दिया था, क्योंकि उनकी स्कूल की बस शाहीन बाग के रास्ते से नहीं आ पाती थी। - अरविंद यादव, मदनपुर खादर निवासी

- फरीदाबाद से नोएडा नौकरी करने जाने में काफी लंबा वक्त लग जाता था। आधे घंटे का सफर डेढ़ घंटे में तय करने से काफी परेशानी होती थी। - राजेश कुमार, सुरजकुंज निवासी

- शाहीन बाग का रास्ता बंद होने से मथुरा रोड पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ा गया था, जिसका कारण हर दिन यहां भीषण ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता था।- दिलबाग, जसोला विहार निवासी
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