सत्ता के गलियारों में आईजी सिविल डिफेंस अमिताभ ठाकुर और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का मामला चर्चा में आया तो रिटायर्ड अधिकारियों का दर्द भी उनकी जुबां पर आने लगा।
रिटायरमेंट के बाद गाजियाबाद में अपना आशियाना बनाकर रहने वाले कई आईपीएस अधिकारियों ने वर्तमान राजनीति पर सीधी चोट की।
यूपी में ही उच्च पदों पर आसीन रह चुके इन अधिकारियों का तो यहां तक कहना था कि ‘देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा आईएएस में सफल होना इतना कठिन नहीं जितना यूपी में काम करना है।
पोस्टिंग के दौरान जब भी नेताओं की बात नहीं मानी तो चंद मिनटों में ही ट्रांसफर हो गया। ड्यूटी का हर दिन राजनीतिक दबाव में बीतता था।’
बच्चों को हमेशा रखा हॉस्टल में
उत्तर प्रदेश के रिटायर्ड डीजीपी और 1974 बैच के आईपीएस अधिकारी विक्रम सिंह ने बताया कि आईपीएस अमिताभ ठाकुर द्वारा लगाए आरोप कोई नई बात नहीं है।
आईपीएस बनने के बाद पहले दिन से ही उन्हें भी राजनीतिक दबाव झेलना पड़ा। दबाव ऐसा था कि बच्चों को नर्सरी कक्षा से ही हॉस्टल में पढ़ाया। सत्ताधारी नेताओं की बात न मानें तो अगले ही दिन ट्रांसफर हो जाता था।
ट्रांसफर भी ऐसी जगह कि वहां परिवार के साथ रहना बड़ा खतरा था। हमेशा से ही सारी जमीन-जायदाद पत्नी के नाम थी। इसके साथ ही एक बड़ी बीमा पॉलिसी, जिससे परिवार को मजबूती मिल सके।
तीन-चार माह में ही हो जाता था ट्रांसफर
वर्ष 1977 बैच के पीपीएस और 1991 में आईपीएस कैडर प्राप्त करने वाले रिटायर्ड डीआईजी इलाहबाद अशोक कुमार त्यागी का एक पोस्ट पर सबसे लंबा कार्यकाल 9 माह का रहा।
वह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में काम करना शायद सबसे मुश्किल था। नेता सिफारिश लेकर आते और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता था। बस अगले कुछ ही दिनों में उनका जिला बदल जाता।
वह मानते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगा भी राजनीतिक दबाव का परिणाम था। जहां असली आरोपियों को छोड़ दिया गया। अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव न हो तो 70 फीसदी क्राइम पहले दिन से कंट्रोल किया जा सकता है।
कुछ साल पहले से ही बढ़ा है राजनीतिक दखल
वर्ष 1977 बैच बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी रामअवतार बताते हैं कि पिछले कुछ साल में सिविल सर्विस और पुलिस सर्विस में राजनीतिक दखल काफी बढ़ गया है।
वर्ष 1995 में रिटायर्ड हुए रामअवतार के अनुसार जिस समय वह नौकरी करते थे उस समय भी नेता सिफारिशें लेकर आते थे।
मगर जो आईपीएस उसूलों पर अडिग रहते थे और सिफारिशें नहीं मानते थे उन पर इस प्रकार का दबाव नहीं होता था। आज के समय तो नेताओं की न मानों तो किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं।