इसके बाद वह वापस ट्रेन से फरीदाबाद पहुंचीं। वहां से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा कि उनकी नर्व क्रैश हो गई है। ऐसे में पैर काटना पड़ेगा। इसके बाद किरन का पैर काट दिया गया। छह महीने के बाद दर्द कम नहीं होने पर जब डॉक्टरों से मिलीं तो उन्होंने कहा कि तुम्हें दौड़ना थोड़े ही है, एक ऑपरेशन और करना पड़ेगा।
यह बात सुनकर किरन को बड़ा धक्का लगा। उन्होंने उसी वक्त मन में ठान लिया कि एक दिन जरूर दौड़कर दिखाऊंगी। इसके बाद किरन 21 किलोमीटर जिसे हॉफ मैराथन कहा जाता है में भी छह बार हिस्सा ले चुकी हैं। वह पांच से 10 किलोमीटर के मैराथन में 15 बार हिस्सा ले चुकी हैं। उनके इस साहस पर दर्जनों संगठन सम्मानित कर चुके हैं।
किरन ने बताया कि पापा भीखा कनौजिया हमेशा कहते थे कि जान बची तो लाखों पाए। यह लाइन मुझे हौसला देती है। अस्पताल आते-जाते समय अपने जैसे लोगों को देखतीं, जो मुझसे भी अधिक दर्दनाक हादसे झेल चुके थे। उनसे जीने की प्रेरणा मिलती। हादसे के बाद जब हैदराबाद लौटी तो वहां के एक अस्पताल में आना जाना हुआ करता था।
उसमें कुछ ऐसे थे जो रनिंग व साइकलिंग करते थे। इसके बाद मैंने अपने जैसों का एक ग्रुप बनाया। डॉक्टरों ने सहायता की और कामयाबी का सफर शुरू कर दिया। शुरूआत में जब कृत्रिम पैर लगाकर अभ्यास करती तो पैर की खाल छिल जाती थी। यह दर्द आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता।
किरन बताती हैं कि मेरे अंदर इतनी क्षमता है, यह मुझे बाद में पता चला। वर्ष 2013 में पांच किलोमीटर के मैराथन से सफर शुरू किया। बाद में यह 10 फिर 21 किलोमीटर हाफ मैराथन तक पहुंचा।
घटना के बाद यह तय कर लिया था कि किसी भी सूरत में घर नहीं बैठना है। उन्होंने बताया कि हैदराबाद में हाफ मैराथन साढ़े तीन घंटे, दिल्ली की रेस 2.58 और इस बार मुंबई मैराथन 2.44 मिनट में पूरी की है।