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गहन निगरानी से एम्स ने बचाई 12 फीसदी ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की जान

Mon, 11 Apr 2016 04:23 AM IST
पवन कुमार/अमर उजाला, नई दिल्ली
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एम्स
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देश में हर वर्ष लाखों लोग ब्रेन स्ट्रोक के शिकार होते हैं। इसमें से करीब 16 फीसदी लोगों की या तो मौत हो जाती है, या वे शारीरिक रूप से अक्षम हो जाते हैं। ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की जान और शारीरिक अक्षमता से बचाने के लिए एम्स न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से एक अध्ययन किया गया।
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इसमें सामने आया है कि बिना खर्च के सिर्फ गहन निगरानी रखकर ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की ना सिर्फ जान बचाई जा सकती है, बल्कि शारीरिक अक्षमता को भी कम किया जा सकता है। अध्ययन को इंडियन न्यूरोलॉजी जर्नल में प्रकाशित करने की तैयारी है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. कामेश्वर प्रसाद ने बताया कि देश में पहली बार इस तरह का अध्ययन ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों पर किया गया है। इस अध्ययन में कोई खर्च नहीं आया, सिर्फ ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों पर गहन निगरानी रखकर उनकी जान और पक्षाघात से बचाने में मदद मिली।
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दो अलग-अलग वार्ड में 77 और 85 मरीजों का ग्रुप बनाया गया

केंद्र सरकार ने मैदान में चोटिल खिलाड़ियों को मौके पर ही मरहम पट्टी देने के आदेश जारी किए हैं।
इस शोध के लिए नर्सेज और रेजिडेंट डॉक्टर्स के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए और उसका पालन करने के लिए कहा गया। इस विषय पर थिसिस लिखने के लिए न्यूरोलॉजी विभाग में एमडी कर रही डॉ. नेहा राय को सबसे बेहतर थिसिस का अवॉर्ड भी दिया गया है।

डॉ. प्रसाद ने बताया कि अध्ययन में उन्हीं मरीजों को शामिल किया गया, जो एम्स न्यूरोलॉजी विभाग में इलाज के लिए भर्ती हुए थे। दो अलग-अलग वार्ड में 77 और 85 मरीजों का ग्रुप बनाया गया।

एक वार्ड में भर्ती मरीजों पर तैयार नए दिशा-निर्देश (एम्स एक्युट स्ट्रोक केयर पाथवे) के अनुसार गहन निगरानी रखी गई, जबकि दूसरे वार्ड में भर्ती मरीजों पर परंपरागत तरीके से निगरानी रखी गई और इलाज दिया गया।

दूसरे ग्रुप के 17.6 फीसदी मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी

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90 दिनों तक निगरानी करने के बाद मरीजों के दोनों ग्रुप का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इसमें सामने आया कि नए स्ट्रोक केयर पाथवे से निगरानी रखने पर करीब 12 फीसदी ज्यादा मरीजों की जान बच पाई।

उन्होंने बताया कि जिन मरीजों पर गहन निगरानी रखी गई, उनमें निमोनिया का प्रतिशत 6.5 फीसदी दर्ज किया गया, जबकि दूसरे ग्रुप के मरीजों में यह प्रतिशत 15.3 दर्ज हुआ।

केयर पाथवे वाले 7.8 फीसदी मरीजों को ही जीवन रक्षक उपकरण की जरूरत पड़ी, जबकि दूसरे ग्रुप के 17.6 फीसदी मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी।
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विशेष प्रशिक्षण देकर नर्सेज को इसके लिए तैयार किया जा सकता है

डॉ. प्रसाद ने बताया कि केयर पाथवे नर्सेज को बताया गया था कि ब्लड प्रेशर, पल्स, हृदय की धड़कन, मधुमेह का स्तर सहित कुछ अन्य बिंदुओं पर विशेष ध्यान रखना है। बताए गए निर्देश के अनुसार इनकी गति बढ़ने-घटने पर कौन सी और कितनी दवा देनी है।

डॉ. प्रसाद ने बताया कि इस तकनीक को लागू करने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है और न ही आर्थिक बोझ बढ़ता है। सिर्फ डॉक्टर्स और नर्सेज को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें इसके लिए तैयार किया जा सकता है।

इस तकनीक को दूसरे अस्पतालों में भी लागू किया जा सकता है। एशियाई देशों में मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह ब्रेन स्ट्रोक है। ब्रेन स्ट्रोक के करीब 50 फीसदी मरीज शारीरिक रूप से अक्षम हो जाते हैं।
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