विदेशी इंप्लांट फिक्स करने में आती है दिक्कत
एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि विदेश से आने वाले इंप्लांट उन देशों के मरीजों के आधार पर तैयार होते हैं। ऐसे में वह इंप्लांट भारत के मरीजों में फिट होने में दिक्कत करते हैं। स्वदेशी तकनीक से तैयार करने के लिए टाइटेनियम का इस्तेमाल किया गया है। यह इंप्लांट के लिए सबसे सुरक्षित व बेहतर धातु है। एमआरआई करवाने के दौरान इसमें दिक्कत नहीं आती।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए एम्स ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर, 29 फरवरी से होगा चालू
भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एम्स ने हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। एम्स ने मरीजों और उनके रिश्तेदारों के साथ बातचीत के दौरान यह पाया कि कुछ मरीजों को दवाओं की आपूर्ति करने, एम्स के बाहर जांच में मदद करने या अन्य अस्पतालों में रेफर करने की आड़ में दलाल उनसे ठगी कर रहे है। इससे निपटने के लिए विशेष उपाय शुरू किए जाएंगे। इसके लिए एक नंबर 9355023969 जारी किया गया है, जो 29 फरवरी से चालू हो जाएगा।
इंप्लांट के परिणाम बेहतर
आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर तैयार हुए इंप्लांट के परिणाम बेहतर आए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि शवों पर किए गए ट्रायल के दौरान इसके परिणाम बेहतर पाए गए। इसमें गुणवत्ता, मूवमेंट, फिटिंग सहित अन्य सभी का ट्रायल किया है। इसके नतीजे बेहतर आए है। अब क्लीनिकल आकलन के लिए मरीजों पर इसका ट्रायल किया जाएगा।
एम्स में होती है सर्जरी
एम्स में कोहनी के अलावा घुटने और कूल्हे के प्रत्यारोपण के लिए सर्जरी होती है। डॉक्टरों की माने तो देशभर में हर साल हजारों इंप्लांट की जरूरत होती है। भारत में इनके निर्माण से न केवल मरीजों को फायदा होगा, बल्कि मरीजों की रिकवरी और गुणवत्ता में भी सुधार होगा।