शुरुआत में ये तय हुआ कि भारत के गेट (इमीग्रेशन) से पहले ही कोरोना को रोकना था। आदेश जारी हुआ और आरएमएल के तीन डॉक्टरों को दिल्ली के हवाई अड्डे पर तैनात कर दिया। 22 जनवरी से स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई। पहले चार दिन में पुणे की लैब में 20 सैंपल की जांच हुई जिसमें से एक भी पॉजिटिव नहीं निकला। इसके बाद भी भारतीय वैज्ञानिक तैयारियों में जुटे रहे। फिर भारत ने रेक्यू ऑपरेशन के मामले में सबसे अधिक उड़ानें भरीं। चीन, ईरान, इटली आदि देशों से हजारों भारतीयों को निकालकर देश वापस लाया है।
स्क्रीनिंग की वजह से ही मिले पहले तीन केस
31 जनवरी तक देश के 21 हवाईअड्डों पर स्क्रीनिंग चल रही थी। उसी स्क्रीनिंग के जरिए केरल के वे तीन केस पकड़ में आए, जो भारत के पहले कोरोना पॉजिटिव थे। अगर उस वक्त सभी बड़े हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग नहीं होती तो इन मरीजों का पता नहीं चलता।
अंतरराष्ट्रीय मानकों पर चल रही थी थर्मल स्क्रीनिंग
वुहान में कोरोना वायरस फैलना शुरू हुआ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिवर्सल स्क्रीनिंग के मानक बने, जिसे हर देश को अपनाना था। जैसे जैसे देशों के नाम बढ़ते चले गए, वहां से आने वाले यात्रियों को स्क्रीनिंग के दायरे में लाया गया। यही वजह थी कि इटली से आने वालों की जांच मार्च के पहले सप्ताह में शुरू हुई थी।
सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बलविंदर सिंह बताते हैं कि शुरूआत से ही कोरोना वायरस हमारे लिए चुनौती था। न दवा, न इलाज, ऐसे में इस महामारी से बचाने के लिए उनके पास सिर्फ आइसोलेशन ही एकमात्र उपाय था। गाइडलाइन के अनुसार उन्होंने अपनी टीम के साथ मरीजों का ध्यान रखा जिसका परिणाम है कि देश में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित मरीज उनके यहां ठीक हुए हैं। 16 में से 7 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं।
पहले से पता था, भारतीय कारोबार पर पड़ेगा बुरा असर
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि पीएमओ के निर्देश मिलने के बाद जब पहली मंत्री समूह की बैठक हुई थी, उस दौरान कोरोना वायरस के कारण भारतीय कारोबार पर पड़ने वाले बुरे असर पर लंबी चर्चा हुई थी। वित्त मंत्रालय को भी ये स्थिति पता थी, लेकिन वक्त विकल्पों को तलाशने का था। अगर दूसरे देशों से तुलना करें तो भारत व्यापार के लिहाज से अभी भी काफी सुरक्षित है।
सरकार के प्रयास बेहतर, अध्ययन की जरूरत
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल कहते हैं कि कोरोना वायरस को लेकर भारत की तैयारियां काफी बेहतर थीं। इसका परिणाम है कि देश में काफी सीमित केस आए हैं लेकिन अभी भी अध्ययन की जरूरत है। भारत, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में कोरोना के कम मरीज आने पर अध्ययन होना चाहिए।