हाईकोर्ट ने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत अब भी ब्रिटिशकालीन भर्ती प्रक्रिया का अनुसरण कर रहा है। पुलिसकर्मियों का चयन शारीरिक शक्ति तथा फिटनेस के आधार पर होता है।
अदालत ने कहा कि चयन प्रक्रिया में भावनात्मक परिपक्वता के पहलू को भी जोड़ा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी सीआईएसएफ में कांस्टेबल पद के लिए अयोग्य ठहराए गए व्यक्ति की याचिका पर की है। न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी की खंडपीठ ने कहा कि भारत में सिर्फ नैतिक आचार और निष्ठा एवं फिटनेस को देखा जाता है।
भावनात्मक परिपक्वता जैसे भावुक कर देने वाले हालात में शांत बने रहने की क्षमता, मुश्किल हालात को संभालने की क्षमता और काम में पहल करने की क्षमता के संदर्भ में कोई आकलन नहीं होता।
'पुलिस भर्ती में भावनात्मक परिपक्वता की भी हो जांच'
कोर्ट
- फोटो : file photo
खंडपीठ ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत अब भी ब्रिटिशकालीन भर्ती प्रक्रिया का अनुसरण कर रहा है। उन देशों की ओर नहीं देख रहा, जहां उम्मीदवारों की मनोवैज्ञानिक जांच की जाती है।
अदालत ने केंद्र सरकार को सलाह दी कि पुलिस बल में शामिल होने के इच्छुक उम्मीदवारों की न सिर्फ निष्ठा, शारीरिक शक्ति और फिटनेस की जांच की जाए, बल्कि उनकी भावनात्मक परिपक्वता की भी जांच हो। याची ने तर्क रखा था कि उसे अदालत ने एक आपराधिक मामले में बरी कर दिया, लेकिन सीआईएसएफ ने नौकरी देेने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा ऐसा कोई कानून नहीं है कि अपराध से आरोपमुक्त होने के बाद किसी को रोजगार न दिया जाए। अदालत ने सीआईएसएफ को निर्देश दिया कि याची को नौकरी देने के अलावा वह तय अवधि से सभी लाभ पाने का भी हकदार है।