पिछले कुछ सालों से जीआरएपी सर्दियों के मौसम में वायु की गुणवत्ता खराब होने पर काम करती है। जीआरएपी ऑड-ईवन लागू करने से लेकर निर्माण कार्य पर बैन भी लगाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गुरुवार की बैठक में कहा गया कि अक्तूबर के पहले सप्ताह से ही वायु की गुणवत्ता खराब(पुअर) स्थिति में बनी हुई है और यह स्थिति महीने के अंत तक बहुत खराब तक जा सकती है।
पर्यावरण एवं विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा था कि पंजाब में पराली जलाने से न केवल देश का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, बल्कि दुनिया में बदनामी भी होगी। देश को पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र का पुरस्कार भी मिला है। ऐसे में राज्यों को इसकी अहमियत समझकर काम करना होगा।
आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने मशीन तैयार किया है। अब इसे जलाने की बजाय किसान एक किलो पराली से 45 रुपये तक की कमाई करेंगे। यह पायलट प्रोजेक्ट ग्रामोद्योग में सफल रहा है। अब पराली जलाने वाले राज्यों में इस तकनीक को लेकर जाने की तैयारी है।
आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर बॉयोमेडिकल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर नीतू सिंह की अध्यक्षता में रिसर्च स्कॉलर्स अंकुर कुमार व प्राचीर दत्ता ने यह तकनीक तैयार की है। प्रो. नीतू के मुताबिक पराली जलाने के चलते दिल्ली गैस की चैंबर बन जाती है। साथ अन्य पड़ोसी राज्य में धुंध छा जाता है, जिसका असर आम आदमी की सेहत पर पड़ता है। इसके लिए किसानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि अब किसान इसी पराली से मालामाल होंगे।
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा सरकार से जल्द मुलाकात
टीम सदस्यों के मुताबिक, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब सरकार और किसानों से इस तकनीक को साझा करने की तैयारी चल रही है। इससे पहले आईआईटी दिल्ली कैंपस में ग्रामोद्योग परिसर में पायलट प्रोजेक्ट लगाया गया था जो सफल रहा है। इन राज्यों में किसानों को मशीन लगाने की जानकारी के साथ बाद में पल्प से तैयार होने वाले प्रोडक्ट बनेंगे।
आठ से दस किसान मिलकर लगा सकते हैं सेटअप
प्रो. नीतू के मुताबिक, इस तकनीक में सबसे पहले एक मशीन लगेगी। आठ से दस किसान मिलकर मशीन सेटअप कर सकते हैं। मशीन पराली को काटेगी और उसमें आईआईटी दिल्ली द्वारा तैयार पेंटेंट केमिकल डाला जाएगा, जिससे पल्प के साथ-साथ लिगमिन तैयार होगा। इस पल्प से इॅको फ्रेंडली कप व प्लेट तैयार किए जाएंगे, जिसे खाओ-फेंको का नाम दिया गया है।
एक एकड़ जमीन से करीब दो टन पराली निकलती है। इससे एक टन पल्प तैयार होगा। इसका इस्तेमाल पेपर मेकिंग प्लांट वाले करते हैं जो 45 रुपये प्रति किलो बिकती है। इसलिए अब किसान घर बैठे पराली से 45 रुपये प्रति किलो की कमाई करेंगे। जबकि लिगमिन बैटरी या फेबीकॉल आदि तैयार करने में प्रयोग होगा। लिगमिन मार्केट में 70 रुपये प्रति किलो के आधार पर बिकता है।