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जश्न-ए-आजादीः बंदिशें मन पर हैं तो हम कैसे हुए आजाद, कब मिलेगी समाज की रुढ़ियों की आजादी

Tue, 14 Aug 2018 11:10 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा
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- फोटो : लाल सिंह
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15 अगस्त यानी हमारी आजादी का पर्व। हम एक आजाद देश के नागरिक हैं, लेकिन हममें से कई लोगों के दिल में अक्सर यह सवाल आता ही होगा कि क्या वाकई आजाद हैं हम? आजाद ख्याल, आजाद जिंदगी आज भी बहुत से लोगों के लिए सिर्फ एक सपना है।

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हमारा कोई सपना जब टूटता है तो तकलीफ होती है। सोचिए उन लोगों के बारे में, जिन्हें अब तक सपने देखने का भी हक नहीं मिला है। देश में आज भी हॉरर किलिंग, जातिवाद, दहेज जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।

अपनी मर्जी से शादी करने पर प्रेमी युगल की हत्या की खबरें लगातार आती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमें अपना जीवन साथी चुनने की आजादी भी नहीं मिल सकती। जाति और धर्म के नाम पर बंदिशें लगाकर जब अपने ही खुशियां छीन लें तो कोई कैसे कह सकता है कि हम आजाद हैं।
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शादी को पवित्र बंधन कहा जाता है, लेकिन उस पर भी समाज की बंदिश हो तो आजादी पर सवाल उठना लाजिमी है। आजादी के 71 साल बाद भी देश के एक हिस्से में शादी करने के लिए एक दलित को पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ती है, क्योंकि एक वर्ग विशेष को उसके घोड़ी पर बैठने पर आपत्ति है।

सपनों के सफर पर निकलने की इच्छा रखने वाले युवक या युवती को कोई खाप, कोई पंचायत या कोई संगठन बंदिशों में जकड़ देता है। कई बार कोई लड़की मनचाहे कपड़े पहनती है, सबसे हंसकर बोलती है तो समाज का एक वर्ग उसके चरित्र पर अंगुली उठाना शुरू कर देता है। तो क्या समाज के एक वर्ग को मनचाही जीवन पद्धति, मनचाहे कपड़े पहनने या खुलकर हंसने की भी आजादी नहीं है?

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शिक्षाविद भी हालात पर चिंतित

- फोटो : लाल सिंह
शिक्षाविद डॉ. हरविंदर सोनी कहते हैं कि आज भी बड़े सामाजिक बदलाव की जरूरत है। कई बार लगता है कि हम आजाद होते हुए भी आजाद नहीं हैं। कोई लड़की सड़क पर अकेले निकलते हुए 10 बार सोचती है। यह कैसी आजादी है।

एनआईओएस चेयरमैन प्रो. चंद्रभूषण शर्मा कहते हैं कि शिक्षा, रोजगार, समानता सबका अधिकार है, लेकिन आज भी यह सबको हासिल नहीं हैं। हम आजाद हैं, लेकिन आज भी सब समान नहीं हो पाए हैं। अवसर समान नहीं है तो सब आगे कैसे बढ़ सकेंगे।

मनोवैज्ञानिक बोले, परंपरा को महत्व है कारण
मनोवैज्ञानिक डॉ. जीआर गुलेचा के अनुसार, हमारा समाज विशेषकर छोटे शहरों एवं गांवों में लोग परंपरा को बहुत महत्व देते हैं। समाज में बदनामी का डर सबसे है। लोग क्या कहेंगे की सोच उन पर हावी रहती है। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है। सब घर के मुखिया की इच्छा के अनुसार चलें, यह कई घरों की परंपरा है।

जब परिवार का कोई सदस्य, खासकर लड़की मुखिया के निर्णय के विरोध में आती है तो उसके अहम को चोट लगती है। इसके बाद गुस्सा उसकी हर भावना पर हावी हो जाता है। पढ़े-लिखे लोग भी इस तरह के अपराध में जुड़ जाते हैं, क्योंकि स्कूली शिक्षा से ज्यादा व्यक्ति पर उसके घर-परिवार एवं परिवेश का असर पड़ता है। लोगों की मानसिकता में परिवर्तन में अभी समय लगेगा।

समान अवसर और सुरक्षा से बदलेंगे हालात
मनौवैज्ञानिक डॉ. आरके शर्मा के अनुसार, हमारा समाज औरों की देखा-देखी करता है। खासकर हम महान या सम्मानित व्यक्तियों से प्रभावित होते हैं। समाज के प्रसिद्ध लोग व्यक्तिगत लाभ के बजाय निस्वार्थ भाव से बदलाव की ओर बढ़ें तो आम लोग भी उनसे प्रेरणा लेंगे। साथ ही सरकार, प्रशासन आदि को भी सबको समान अवसर और सुरक्षा देने की आवश्यकता है। इसी से हम सही अर्थों में सबके लिए आजादी की ओर बढ़ सकेंगे।
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