इनमें बड़ी तादाद में मरीज भर्ती रहते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के प्रबंध देखे जाएं तो इक्का-दुक्का अस्पताल को छोड़कर किसी में भी नहीं हैं। ज्यादातर नर्सिंग होम्स में तो रात के समय मरीजों के साथ केवल नर्सिंग स्टाफ ही रहता है।
डॉक्टर तो शाम ढलते ही घरों को चले जाते हैं। ऐसे में पीछे से अस्पताल का पूरा संचालन नर्सिंग स्टाफ के कंधों पर रहता है। यदि पीछे से कोई गंभीर मरीज आ जाए तो उसे डॉक्टर से पहले नर्सिंग स्टाफ देखता है और उसकी जानकारी डाक्टर को देता है।
फिर डाक्टर का मन है कि वह अस्पताल मरीज को देखने आए या फिर उसे आगे भिजवा दे। इसी तरह अस्पताल में न तो दिन के समय और न ही रात के समय कोई सुरक्षा गार्ड रहता है। यदि किसी नर्सिंग होम में सुरक्षा गार्ड है भी तो रात को डॅाक्टर के जाते ही आराम फरमाने लग जाते हैं।
अमर उजाला की टीम ने इस संदर्भ में शुक्रवार व शनिवार को जिले के निजी अस्पतालों का दौरा कर वहां सुरक्षा गार्डों की तैनाती के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि कहीं भी सुरक्षा गार्ड नहीं है।
कई अस्पताल संचालकों ने तो बात ही नहीं की और एक-दो संचालकों ने बताया कि दिन के समय तो गार्ड की जरूरत नहीं है तो केवल रात में गार्ड लगाए हुए हैं। इतना ही नहीं शुक्रवार की देर रात को भी कई निजी नर्सिंग होम्स में दौरा किया तो वहां रात को भी सुरक्षा गार्ड नहीं मिले।