गुड़गांव में रंगोत्सव की पूर्व संध्या पर बाजारों में अच्छी खासी भीड़ उमड़ी रही। पिचकारी, रंग, गुलाल और मिठाइयों को खरीदने वाले दुकानों पर मानो टूट पड़े हों। अब तक सूनी नजर आ रही दुकानों पर जबर्दस्त बिकवाली दिखी।
बारिश के बाद जहां लग रहा था कि होली का रंग फीका रह जाएगा। मगर होली की पूर्व संध्या पर दृश्य बिल्कुल साफ हो गया। बच्चे, जवान और बूढ़े सभी होली के रंग में पूरी तरह से रंग चुके हैं। सभी यादगार होली मनाने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे चुके हैं। होलियारों की टोली बन चुकी है। रंग खेलने की पूरी रणनीति तैयार कर ली गई है। खिली धूप को देखकर भी सभी उत्साहित हैं।
गली, मोहल्लों और कॉलोनियों में बच्चों की टोली घूम-घूमकर लोगों पर रंग डाल रही है। बुधवार से ही सभी एक दूसरे पर रंग बरसाने लगे हैं। घरों और छत से भी होली के रंग बरसने लगे हैं। सेक्टरों में भी ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है।
फागुन गीत गाने वालों की टोलियां नहीं दिखतीं अब
अपने जमाने की होली आज बहुत याद आती है। अब वैसा माहौल नहीं है। बात वर्ष 1949-50 की है जब मैं अपने दोस्तों के साथ माह भर पहले से ही होली की तैयारी में जुट जाता था। जिस दिन धुलंडी होती थी उस दिन के क्या कहने। रंगों नहीं मिला तो कीचड़ और पानी से होली खेली जाती थी। बड़ा आनंद आता था। फागुन गीत गाने वालों की टोलियां कई दिनों पहले से ही लय में आ जाती थी। आज की होली और उस जमाने की होली में बड़ा अंतर था। अब आधुनिकता से सब कुछ बदल दिया है।