इस साल फरवरी में कोलकाता के सिनेमा घरों में जबरदस्त सफलता हासिल करने वाली उत्सव मुखर्जी की फिल्म भिटू (कायर) दिल्ली में हुई स्क्रीनिंग में औंधे मूंह गिरी।
बंगाल एसोसिएशन द्वारा स्वत: नियुक्त प्रतिनिधियों के समूह ने तय किया है कि फिल्म 'भालो बंगाल' संस्कृति का अनुसरण नहीं कर रही है।
एसोसिएशन ने रविवार को फिल्म की 40 मिनट की स्क्रीनिंग के बाद तय किया कि फिल्म में दिखाई गई लुका-छिपी की कहानी और गाली-गलौच उचित नहीं है। एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी तपन सेनगुप्ता ने फिल्म का एकतरफा विरोध किया।
जबकि उत्सव मुखर्जी कहते हैं कि वे एसोसिएशन के फैसले से सहमत नहीं है और फिल्म का आधा ही विश्लेषण किया गया है। जोकि वास्तविकता से अलग है।
'हम सब वयस्क हैं, इसे देखने देना चाहिए'
गुड़गांव में रहने वाली जयिता सेन, जो स्क्रीनिंग के दौरान मौजूद थी, कहती हैं, "हमने एक घंटा इंतजार किया और हमें लगा कि स्क्रीनिंग अभी जारी है, इसे पूरा देखना चाहिए था। हम सब वयस्क हैं।
जयिता सेन के मुताबिक लोगों को इसे देखने देना चाहिए और उन्हें खुद ही तय करना चाहिए। अगर वे इसे पसंद नहीं करते हैं तो वे इसे छोड़ सकते हैं। आप स्क्रीनिंग को ऐसे नहीं रोक सकते। इस तरह की नैतिक पुलिसिंग स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
वहीं मुखर्जी कहते हैं कि भिटू (कायर) को आम जनता से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। यह थ्रिलर कहानी दो बहनों के इर्द-गिर्द घूमती है। इनमें से एक बहन की हालत गाली गलौच सहते बच्चे की तरह है, जबकि दूसरी कुछ भी बोलने के लिए पूरी तरह आंतकिंत है। यह एक गंभीर फिल्म है जिसे लोगों ने खूब सराहा है।
उन लोगों ने इसकी तारीफ कि जिन्हें मंनोरजन पसंद और उन्होंने भी जिनको परिवारिक नाटक पसंद है। मुखर्जी ने बताया कि खासकर महिलाओं को ये ज्यादा अच्छी लगी। लोगों को इसकी कुछ विषय वस्तु को लेकर आपत्ति हो सकती है लेकिन इसकी रविवार को हुई स्क्रीनिंग अधूरी थी।
एक दृश्य पर ही क्यों रोक दी स्क्रीनिंग?
इसमें हस्तमैथुन पर एक दृश्य है, जिसमें बच्चे को गाली भी दी जाती है। ये दोनों ही चीजें वयस्क दर्शकों के लिए आम बात हो सकती है। लेकिन स्क्रीनिंग के दौरान ही इस दृश्य के तुरंत बाद सेनगुप्ता प्रोजेक्शन रूम में गए और स्क्रीनिंग को रोक दिया।
दिलचस्प बात यह है कि एसोसिएशन ने खुद ही सितंबर के अंत में मुखर्जी को संपर्क किया था। एसोसिएशन प्रत्येक महीने के अंतिम रविवार को गोल मार्केट के मुक्ताधरो ऑडिटोरियम में फिल्मों की स्क्रीनिंग रखता है।
एसोसिएशन के ही एक सदस्य ने इस फिल्म को देखा और रविवार की स्क्रीनिंग के लिए मंजूर किया था। लगभग एक महीने की चर्चा के बाद मुखर्जी ने अपनी टीम को स्क्रीनिंग के लिए यहां लेकर आने का फैसला किया था।
वे अपने खर्च पर यहां आए और ठहरे। साथ ही पोस्टर को दोबारा बनवाने के लिए भेजा। सेंसर बोर्ड ने इसे 'ए' रेटिंग दी थी। इस रेटिंग को सभी प्रकार की प्रचार सामग्रियों में स्पष्ट किया गया था।
दर्शकों के बीच कोई भी बच्चा नहीं था। हालांकि एक महिला एक बच्चे को साथ लेकर आयी थी। लेकिन यह उस महिला की ही गलती थी। सेन ने ये सब बातें कही।
'थोड़ा बहुत हर कोई स्वीकार करता है, लेकिन..'
सेनगुप्ता के मुताबिक स्क्रीनिंग का उद्देश्य 'शुष्टो, भालो, बांग्ला बोई (स्वस्थ, अच्छी, बंगाली फिल्म)' के साथ बंगला भाषा और बंगाली संस्कृति के प्रचार-प्रसार का है।
यह फिल्म इनमें से पहली दो कैटेगरी पर खरी नहीं उतरती। वे अपने मेंबर्स को उनके मित्रों और परिवार को साथ लेकर आने के लिए कहते हैं। यह ऐसी फिल्म है जोकि आप उनके साथ नहीं देख सकते। उनकी गलती ये रही कि उन्होंने पहले इस नहीं देखा था।
हालांकि वे कहते हैं कि एसोसिएशन को ऑन स्क्रीनिंग चंबन पर कोई आपत्ति नहीं है। हर कोई थोड़ा बहुत स्वीकार करता ही है। यह जीवन का हिस्सा है और उनकी इसपर कोई व्यक्तिगत राय नहीं है। लेकिन यह फिल्म बंगाली संस्कृति का प्रचार-प्रसार नहीं करती। केवल एसोसिएशन के 10-12 सदस्य, उनके परिजन और कुछ मित्र ही स्क्रीनिंग के दौरान मौजूद थे।
उनके बहुत कम लोग यहां थे क्योंकि स्क्रीनिंग लक्ष्मी पूजन से एक दिन पहले थी। हालांकि उत्सव मुखर्जी उनसे नाराज है। इसे बर्दास्त न करना ड़रावनाहो सकता है। लेकिन वे दिल्ली के दर्शकों के सम्मान के साथ जा रहे हैं।