मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर में इस वर्ष 106 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया है। अगर पूर्वानुमान सही साबित हो जाता है तो पर्यावरणविदों के मुताबिक हिंडन और यमुना के किनारों पर कहर बरपेगा।
धीरे-धीरे सूखती जा रही नदियों के किनारे हुए अतिक्रमण पर खुद नदी ही गाज गिरायेगी। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस हालात का जिम्मेदार कौन है। जब नदियों के किनारे अतिक्रमण और अवैध खनन की यह बीमारी लगनी शुरू हुई तो इस बीमारी की रोकथाम किस एजेंसी को करनी थी।
यही नहीं सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि किसने और कब इसे रोकने की कवायद की। क्या वे लोग हिंडन की धारा के सूखने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या इसके पीछे कोई बड़ा षडयंत्र रहा होगा? वह कौन था, जिसने ऐसे लोगों को यहां बसने का लॉलीपॉप दिया और अब अगर भविष्य में हिंडन में बारिश का औसत से 6 फीसदी ज्यादा पानी आने की वजह से हाहाकर मचता है तो वे लोग क्या इनकी मदद को आगे आएंगे? क्या प्रशासनिक एजेंसियों ने अपनी तैयारी पूरी कर रखी है?
सिंचाई विभाग का यह है कहना:
सिंचाई विभाग ओखला के अधिशाषी अभियंता राजेश्वर सिंह यादव का कहना है कि विभाग के पास केवल बांध की जमीन है। अगर क्षेत्र अधिसूचित है तो अतिक्रमण की सूरत में प्राधिकरण कार्रवाई करता है और सिंचाई विभाग के अलावा जिला प्रशासन मदद करता है।
खेती की जमीन पर स्थायी निर्माण करना अवैध है और इस पर सिंचाई विभाग समय-समय पर कार्रवाई करता है। इस मामले में कई मुकदमें भी हैं। विभाग का कहना है कि साढ़े तीन लाख क्यूसेक पानी आने तक सबकुछ ठीक रहेगा। इससे ज्यादा पानी नदी में आता है तो ही हालात प्रभावित हो सकता है। तटबंध 100 फीसदी सुरक्षित हैं और इसमें कहीं कोई टूट नहीं है।
प्राधिकरण का यह है कहना:
नोएडा विकास प्राधिकरण के एसीईओ राजेश प्रकाश का कहना है कि नदियों के डूब क्षेत्र में किसी तरह की कार्यवाही कराई जाती है तो उसमें सिंचाई विभाग का अहम रोल होता है। चूंकि सिंचाई विभाग इस क्षेत्र के लिए विशेषज्ञ एजेंसी है। वर्ष 2014 में हैबतपुर में ऐसे ही अतिक्रमण पर प्राधिकरण ने 500 मकान गिराये थे।
ऐसे अभियान के लिए ज्यादा से ज्यादा फोर्स की जरूरत होती है। वहीं इस अभियान के लिए कई माह पहले से योजना बनाई जाती है। हालांकि अभियान के बाद हंगामा भी मचा। यहां कॉलोनाइजर षडयंत्र कर पब्लिक प्रेशर बनाते हैं। यही नहीं अगर हजारों लोगों को एक जगह से हटाते हैं तो उनको दूसरी जगह विस्थापित कर जगह भी देनी होगी। इसकी भी तैयारी करनी होती है। इनको कैसे बसायेंगे। इस बाबत पर्थला और हैबतपुर में नोटिस भी दिया गया।
जिला प्रशासन का यह है कहना:
गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी एनपी सिंह का कहना है कि डूब क्षेत्र या अन्य के अधिसूचित या गैर अधिसूचित क्षेत्र में अगर सिंचाई विभाग और प्राधिकरण की ओर से ऐसे किसी अतिक्रमण को हटाने के लिए मदद की गुहार की जाती है तो उन्हें मजिस्ट्रेट फोर्स दिया जाता है। सोरखा, ककराला, कुलेसरा में जिला प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने में मदद की है। अगर ग्राम सभा की जमीन पर अतिक्रमण होता है तो उसे जिला प्रशासन खुद ही हटवाता है। इसके अलावा अगर हमें किसी ने सूचित किया तो हमारी ओर से एक्शन लेते हुए संबंधित एजेंसी को निर्देश दिया जाता है।
पर्यावरणविद का यह है कहना:
पर्यावरणविद और हिंडन के मामलों के विशेषज्ञ बीपी बघेल का कहना है कि हिंडन के किनारे छिजारसी से कुलेसरा तक का 8 किलोमीटर का डूब क्षेत्र अतिक्रमण से प्रभावित है। यहां स्टोन क्रेशर, हॉट मिक्स प्लांट और मकान बना लिए गए हैं। इसकी वजह से नदी की धारा दिन प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है। नदी के सिकुड़ने पर अतिक्रमण भी दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
हालांकि अभी गाजियाबाद में सबसे ज्यादा अतिक्रमण है। यमुना की बाढ़ रोकने के लिए जो तटबंध बनाया गया है। उस पर रास्ता बना दिया गया है। गौतमबुद्ध नगर में हिंडन के बायें कोई तटबंध नहीं है। ऐसे में ग्रेटर नोएडा के बहलोलपुर, शाहबेरी, तिगड़ी, हैबतपुर, बिसरख, पतवाड़ी, इटेहड़ा पर खतरा बरकरार है। अगर यमुना और हिंडन की मार से बचने के लिए प्रशासन को पहले ही तैयारी पूरी करनी होगी।