हिंदी के वजूद की लड़ाई के लिए आज भी खाकी वर्दी में अध्यापक रामकुमार (गुरुजी) का दिल धड़कता है। उन्होंने वर्ष 1992 में अपने गांव मांडौढ़ी झज्जर में एक स्कूल की स्थापना की। इस स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय उन्होंने हिंदी की कई खामियां महसूस कीं, जिसके बाद खुद हिंदी के वजूद की लड़ाई में एक सिपाही की तरह कूद पड़े।
सौभाग्य से इसी साल रामकुमार हरियाणा पुलिस में भर्ती हो गए। इसके बाद वर्ष 1998 से 2008 तक मधुबन स्थित हरियाणा पुलिस पब्लिक स्कूल में शिक्षक के रूप में तैनात रहे। वर्तमान में फरीदाबाद पुलिस आयुक्त कार्यालय में जनसूचना अधिकार प्रकोष्ठ के प्रभारी के पद पर तैनात हैं।
हिंदी को लेकर इनकी पीड़ा नौकरी में आने के बाद भी कम नहीं हुई। पुलिस सेवा में रहते हुए इन्होंने 1967 में भारत सरकार द्वारा देवनागरी लिपी व हिंदी वर्तनी का मानकीकरण नाम से किए गए संशोधन को पढ़ा, समझा व उस पर आधारित एक पुस्तक ‘अब हिंदी बेहद आसान’ लिखी।
इस पुस्तक में हिंदी में किए गए संशोधन को अत्यंत सरल रूप में लिखने व पढ़ने के लिए समझाया गया है, जिसमें व्यंजन संयोग व पंचमाक्षर का प्रयोग बेहद महत्वपूर्ण है।
कार्यशालाओं में किया समझाने का प्रयास
हिंदी को लेकर उनकी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने ड्यूटी के बाद कई बार शिक्षकों की कार्यशाला का भी प्रतिनिधित्व किया व हिंदी शब्दावली व लेखन को विस्तार से समझाने का प्रयास किया।
रामकुमार ने बताया कि उन्होंने लोगों को समझाने का प्रयास किया है कि भाषा वह यंत्र है, जिसके माध्यम से हम पढ़ने, लिखने का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह जितनी सुदृढ़ होगी, इसके परिणाम उतने की सार्थक सिद्ध होंगे।