हाईकोर्ट ने क्रेडिट व डेबिट कार्ड से लेने देन पर अधिभार लगाने के विरोध में दायर याचिका पर जवाब दाखिल करने पर केंद्र व भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के प्रति नाराजगी जताई है। अदालत ने दोनों को जल्द से जल्द इस मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका में इस निर्णय को अवैध और भेदभावपूर्ण बताया गया है।
मुख्य न्यायाधीश जी.रोहिणी और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ के समक्ष पेश केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें जवाब दाखिल करने का समय प्रदान किया जाए। अदालत ने कहा आपको पहले से ही समय प्रदान किया जा चुका है यह रवैया ठीक नहीं है।
अदालत ने केंद्र व आरबीआई को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई एक मार्च तय की है। यह जनहित याचिका अधिवक्ता अमित साहनी ने दायर की है। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद कर दिए है। अब लेनदेन मात्र क्रेडिट व डेबिट कार्ड से ही रह गया है ऐसे में शुल्क लगाना अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है।
याची ने कहा कि इस निर्णय से वह हर व्यक्ति प्रभावित है जिसका बैंक में खाता है और उसका बड़े पैमाने पर राष्ट्र के कल्याण में योगदान है। उन्होंने कहा क्रेडिट व डेबिट कार्ड से पैट्रोल भरवाने पर भी शुल्क असमान और मनमाना रवैया है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि मंत्रालय और आरबीआई देशभर के बैंको पर निगरानी के लिए दिशा निर्देश व नियम तय करते है। ऐसे में उन्हें क्रेडिट-डेबिट कार्ड से लेनेदन पर शुल्क लगाने पर रोक लगाने का निर्देश दिया जाए।
उन्होंने कहा अधिभार लगाना न केवल अवैध और भेदभावपूर्ण है बल्कि यह नकद में काले धन का प्रचलन को बढ़ावा देता है। याचिकाकर्ता ने कहा कि आम रूप से देखा गया है कि क्रेडिट व डेबिट से लेनेदेन पर बैंक 2.5 प्रतिशत तक का लेवी अधिभर लगा रहे है। इस तरह का सरचार्ज नहीं लगाया जाना चाहिए।