हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को अंडा देने वाली मुर्गियों पर क्रूरता रोकने के लिए छह सप्ताह के भीतर दिशा-निर्देश का मसौदा तैयार करने का निर्देश दिया है। मुर्गियों के प्रति क्रूरता रोकने के संबंध में दायर एनजीओ एनीमल प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइजेशन की कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह निर्देश दिया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि देश में अंडा देने वाली करीब 40 करोड़ मुर्गियों को जीवन के ज्यादातर समय तार से बने पिंजरों में रखा जाता है, जो उन पर क्रूरता है।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायूर्ति वीके राव की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और अन्य सभी संबंधित पक्षों को छह सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर पशु-पक्षी बोल नहीं सकते तो इसका मतलब यह नहीं कि हम उन पर क्रूरता करें। याचिकाओं पर अगली सुनवाई 31 अक्तूबर को होगी।
याचिकाकर्ता एनजीओ ने मुर्गियों को रखने के लिए तार से बने पिंजरों पर रोक लगाने, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को अंडा देने वाली मुर्गियों के साथ क्रूरता पर रोक के लिए नियमों का मसौदा जारी करने का निर्देश देने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि तार से बने पिंजरे बेहद छोटे होते हैं और मुर्गियां इनमें खड़ी तक नहीं हो पातीं और न ही अपने पंख फैला पाती हैं। उनके पंख पिजरे की दीवारों में फंस जाते हैं।