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Delhi: नाबालिगों से जुड़े यौन अपराध के मामले जल्दबाजी में नहीं निपटाएं, दिल्ली हाईकोर्ट ने कह यह बात

Tue, 02 Jan 2024 07:31 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि अदालतों को ऐसी पीड़ितों की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्थिति के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए क्योंकि उन्हें आघात के कारण घटना का सटीक विवरण देने में कठिनाई हो सकती है।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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उच्च न्यायालय ने कहा कि नाबालिगों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में एफआईआर केवल मुद्रित कागज नहीं है, बल्कि उनका आघात बहुत बड़ा है। ऐसे में पीड़ितों के तनावपूर्ण और जीवन बदल देने वाले अनुभव को अदालतों द्वारा जल्दबाजी में नहीं निपटाया जाना चाहिए।

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न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि अदालतों को ऐसी पीड़ितों की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्थिति के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए क्योंकि उन्हें आघात के कारण घटना का सटीक विवरण देने में कठिनाई हो सकती है। अदालत ने कथित घटना की तारीख के संबंध में उसके बयानों में विसंगति के आधार पर आरोपी के सीसीटीवी फुटेज और कॉल डेटा रिकॉर्ड को संरक्षित करने की एक नाबालिग पीड़िता की याचिका को खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए ये टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पीड़िता के जीजा और उसके दो दोस्तों द्वारा कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया था और मानसिक आघात के कारण वह पुलिस को घटना की सही तारीख बताने में असमर्थ थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट को ऐसे मामले में संवेदनशीलता और सहानुभूति बरतनी चाहिए थी।

अदालत ने कहा कि पीड़िता इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज की देखरेख में रही है और अपने मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के बाद उसने उन तारीखों पर भ्रम को स्पष्ट किया जब उसके साथ मारपीट की गई थी और जांच के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने के लिए एक आवेदन दायर किया था। अधिकारी को सही तारीख के सीसीटीवी फुटेज और सीडीआर एकत्र करने के लिए कहा गया। अदालत ने कहा कि अफसोस की बात है कि वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य के एक महत्वपूर्ण टुकड़े यानी घटना की वास्तविक तारीख के सीसीटीवी फुटेज, साथ ही आरोपी व्यक्तियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड को एकमात्र आधार पर संरक्षित करने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। अदालत ने आदेश में कहा कि पीड़िता ने अपनी प्रारंभिक शिकायत में घटना की एक अलग तारीख का उल्लेख किया था।
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अदालत ने पाया कि पीड़िता, जो प्रासंगिक समय में लगभग 16 वर्ष की थी, उसके घर में चोरी से घुसने के बाद उसके जीजा और दो अन्य लोगों ने दुष्कर्म किया था।

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सूचना का अधिकार अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग पर हाईकोर्ट ने चिंता जताई
हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि उसने ऐसे मामलों को देखा है जिससे सरकारी अधिकारियों में काफी भय पैदा हो रहा है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य सूचना तक पहुंच प्रदान करना एवं जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन इसका दुरुपयोग इसके इच्छित उद्देश्य को कमजोर कर रहा है।

अदालत ने यह टिप्पणी शिशिर चंद की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने टाटा मेमोरियल अस्पताल के डॉ. अतुल छाबड़ा की कथित चिकित्सीय लापरवाही को लेकर जानकारी मांगी थी। उसने यह जानकारी कई माध्यमों से मांगी तो केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने उसकी शिकायत लेने से अपने कार्यालय को मना कर दिया था। उसी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ता की मांग पर अदालती ने पहले ही अपना फैसला दे दिया है। उसके बावजूद वह कई माध्यमों से इसी मुद्दे पर जानकारी मांगा करता था। इससे तंग आकर सीआईसी ने उसकी शिकायत लेने से मना कर दिया था।
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