छठ, झाग और दिल्ली की सियासत
अस्ताचलगामी सूर्य का अर्घ्य देने से एक दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट के यमुना नदी में स्नान की इजाजत न दिए जाने से एक बार फिर यमुना का प्रदूषण चर्चा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिग्नेचर ब्रिज से यमुना नदी का जीवन खत्म हो जाता है। नदी में जहां नजफगढ़ नाला मिलता है, वहां पानी में घुली ऑक्सीजन (डीओ) नहीं है और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) मानक से तीस गुना ज्यादा है । दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की अक्तूबर की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में प्रवेश करने के बाद से वजीराबाद डैम तक यमुना की सेहत ठीक रहती है। बड़ी दिक्कत नजफगढ़ नाले के मिलने के बाद आती है। यहां से यमुना का दम घुट जाता है। आईएसबीटी पुल के नजदीक डीओ नहीं है। जबकि मानक एक लीटर में 5 मिग्रा से ज्यादा होना चाहिए। वहीं, कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन, बीओडी की मात्रा मानक प्रति लीटर तीन मिग्रा की जगह 35 मिग्रा प्रति लीटर है। कालिंदी कुंज पर डीओ शून्य व बीओडी 44 तक पहुंच है। यह दोनों पानी की गुणवत्ता को मापने के अहम पैरामीटर हैं। यहां से कालिंदी कुंज तक दुबारा से यमुना में जीवन नहीं लौट पाता। प्रदूषण का स्तर आगे और भी खराब होता जाता है।
ओखला बैराज के प्रदूषण यमुना पर दूर-दूर तक फैली झाग के तौर पर देखा जा सकता है। छठ महापर्व से पहले इस पर व्रतियों के साथ अदालत व सियासी गलियारों तक में हलचल है। बुधवार हाई कोर्ट ने छठ व्रतियों की सेहत का हवाला देते हुए नदी में स्नान करने की इजाजत नहीं दी। इसी मसले पर अमर उजाला संवाददाता संतोष कुमार ने यमुना नदी के शोधार्थी व फिलहाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के प्रोफेसर डॉ. रामकुमार सिंह और नदी विशेषज्ञ डॉ. फैय्याज खुदसर से बात की। इससे समझा जा सकेगा कि साल भर प्रदूषित नदी की झाग छठ के दौरान किस तरह चर्चा में आती है।
साल भर रहता प्रदूषण, छठ में झाग की चर्चा आम
प्रश्न. छठ महापर्व है और यमुना झाग की मोटी से ढकी हैं, प्रदूषण इसी वक्त कैसे बढ़ा हुआ है?
उत्तर. ऐसा नहीं है। बारिश का मौसम छोड़ दें तो यमुना साल भर प्रदूषित है। इस वक्त झाग से सिर्फ यह दिखने लगा है कि नदी प्रदूषित है।
प्रश्न.तब साल पर झाग क्यों नहीं होता?
उत्तर. कालिंदी कुंज में वैसे तो झाग हमेशा बनता है, लेकिन उसकी मात्रा कम होती है। सर्दियों में झाग बनना ज्यादा होता है। वह इसलिए इस दौरान पानी में आक्सीजन बनने की प्रक्रिया, जिसे ऑक्सीजनेशन कहते हैं, धीमी पड़ जाती है। इससे सतह के प्रदूषक खत्म नहीं होते। यह झाग बनने की आदर्श स्थिति है। ऊंचाई से गिरता पानी झाग के तौर पर नजर आता है। सर्दियां शुरू होने के साथ ही छठ महापर्व आता है और इसमें सबका फोकस नदी की तरफ बढ़ जाता है।
प्रश्न. इसमें कौन-कौन से केमिकल हैं?
उत्तर. फास्फेस्ट समेत केमिकल का समूह, जिसे सर्फेक्टेंट कहा जाता है। इस समूह के रसायनों की प्रकृति है कि जल के संपर्क में आने से यह उसके सतह के तनाव को, जिसे सरफेस टेंशन कहते हैं, कम कर देते हैं।
प्रश्न. यह किस इंडस्ट्री से आता है?
उत्तर. इसमें ग्लास क्लीनर, लॉन्ड्री डिटर्जेंट, खाद्य सामग्री, कीटाणुनाशक, टेक्सटाइल डाई, पेंट्स, कई प्रकार के खतरनाक नील हरित शैवाल, फैब्रिक डाई (रंजक) प्लास्टिक रंजक तथा अन्य प्लास्टिक मृदुकारी पदार्थ, शैंपू, कृषि रसायन आदि से। इसका मतलब यह भी हुआ कि नालों का अशोधित पानी यमुना में पहुंच रहा है।
प्रश्न. सर्फेक्टेंट काम कैसे करते हैं?
उत्तर. सर्फेक्टेंट पानी और हवा के बीच एक दीवार सी बना देते हैं। इससे हवा में मौजूद ऑक्सीजन पानी में घुल नहीं पाती। नतीजा जलीय जीवों के लिए जरूरी ऑक्सीजन; जिसे डिजाल्व ऑक्सीजन (डीओ) कहते हैं, की कमी हो जाती है।
इतना ही नहीं, सर्फेक्टेंट पानी में यूट्रोफिकेशन की प्रक्रिया को भी तेज कर देते हैं। इस प्रक्रिया के तेज होने से पानी में शैवाल की मात्रा बढ़ने लगती है। इससे जल में घुली ऑक्सीजन की खपत बढ़ जाती है। इससे साफ हो जाता है कि सर्फेक्टेंट दो तरह से पानी में घुली ऑक्सीजन का कम कर देता है।
प्रश्न. फिर भी, कुछ लोग मछलियां पकड़ते दिख जाते हैं. यह कहां से आती हैं?
उत्तर. असल में बुआ ( वालेगो), मांगुर (क्लरियास), सिंघी (हैट्रोपनिस्टेस) जैसी कुछ एक ऐसी मछलियां हैं, जो हवा में सांस ले लेती हैं, इनको पानी में घुली ऑक्सीजन की जरूरत कम रहती है। इनके लिए ही मछुआरे नदी में जाल बिछाए दिख जाते हैं।
प्रश्न. इस तरह के पानी में स्नान करने का असर क्या पड़ता है?
उत्तर. इसका त्वचा पर ही असर नहीं पड़ता, प्रदूषक कोशिकाओं की झिल्ली पार करके साइटोप्लाजाम में पहुंचकर पूरे शरीर के सामान्य कोशिकीय कार्य को क्षति पहुंचाते हैं। यहां तक कि यह मछलियों के श्वसन तंत्र (गिल) और उनकी आंख भी खराब कर देते हैं।