हाईकोर्ट ने सरकार को लेस्बियन, गे, बायोसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय के लिए पारिवारिक कानून बनाने और इस मुद्दे की पड़ताल के लिए समिति बनाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। एक जनहित याचिका में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के जवाब के बाद तेजिंदर सिंह की जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कानून बनाना विधायिका का अधिकार है।
खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए याची से पूछा कि क्या कोर्ट विधायिका को समिति बनाने का निर्देश दे सकती है। सरकार ने इस मुद्दे की पड़ताल के लिए समिति बनाई है तो वह ऐसा कर सकती है।
केंद्र सरकार ने याचिका पर जवाब दाखिल कर कहा था कि एलजीबीटी समुदाय के कल्याण और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सभी कदम उठाए जा रहे हैं।
याची ने एलजीबीटी समुदाय के लोगों के अधिकारों को ध्यान में रखकर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन करने, उनके विवाह, बच्चा गोद लेने और अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए एलजीबीटी आयोग बनाने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिका में कहा गया था कि देश का संविधान सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करता है। किसी के साथ भेदभाव न हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। याची का कहना था कि एलजीबीटी समुदाय के लोगों की संख्या बेहद कम है, लेकिन उन्हें समान मूल अधिकार प्राप्त हैं।