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Delhi: आरोपियों को बरी करने के खिलाफ अपील दायर करने में 28 साल की देरी को माफ करने से हाईकोर्ट का इनकार

Wed, 12 Jul 2023 07:04 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

अदालत ने कहा है कि इसके लिए कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने 1995 में साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया था।
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दिल्ली हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक मामले में कई आरोपियों को बरी करने के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में राज्य द्वारा की गई लगभग 28 साल की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा है कि इसके लिए कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने 1995 में साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया था।

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अभियोजन पक्ष ने दंगों के मामलों को देखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गठित दो सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का हवाला देते हुए सबूतों की कमी या घटिया जांच के कारण बंद ममालों इसके खिलाफ अपील दायर की जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के कारण अपील को तुरंत अंतिम रूप नहीं दिया जा सका, जिसके परिणामस्वरूप और देरी हुई, और अब 27 साल और 335 दिनों की देरी की माफी के लिए आवेदन के साथ अपील की अनुमति प्रदान की जाए।

 

जस्टिस सुरेश कुमार कैत और नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि देरी की माफ़ी के लिए आवेदन में कोई योग्यता नहीं है और इसे खारिज कर दिया। पीठ ने कहा 28 वर्षों की देरी को समझाने के लिए कोई भी कारण नहीं दिया गया है। गौरतलब है कि एसआईटी ने रिपोर्ट 15 अप्रैल, 2019 को दी थी लेकिन उसके बाद भी लगभग चार साल की देरी हो गई है जिसके लिए कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

पीठ ने हाल ही में तीन अपीलों को खारिज कर दिया जहां देरी 1000 दिनों से कम थी। पीठ ने कहा कि अत्यधिक देरी के लिए राज्य द्वारा उद्धृत आधार न्यायोचित नहीं थे। प्रारंभ में 1991 में दंगा, लूटपाट और सिखों की हत्या की घटनाओं के संबंध में आईपीसी के तहत दंगा, हत्या के प्रयास, घर को नष्ट करने के इरादे से आग लगाने के अपराध के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। दंगें 31 अक्टूबर, 1984 और 3 नवंबर, 1984 के बीच हुए थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। 31 अक्टूबर, 1984 को उनके सिख अंगरक्षकों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। 28 मार्च, 1995 को एक सत्र अदालत द्वारा मुकदमे के बाद आरोप तय किए गए और आरोपियों को बरी कर दिया गया।

 

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि अभियुक्तों को बरी कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य के दौरान पेश किए गए गवाह विश्वसनीय नहीं पाए गए और, यदि अभियोजन या शिकायतकर्ता बरी किए जाने के फैसले से व्यथित थे, तो इसमें कुछ भी नहीं था। जिसने उन्हें अपील दायर करने से रोक दिया।

अब अपील दायर करने का कारण एसआईटी द्वारा अपनी रिपोर्ट में दी गई राय है कि ट्रायल कोर्ट केवल एफआईआर दर्ज करने में देरी या गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी के कारण मामले की कमजोरी पर विचार नहीं कर सकता है। एफआईआर दर्ज करने में देरी स्पष्ट थी क्योंकि राज्य को एफआईआर दर्ज करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। दंगों के दौरान 3,000 से अधिक सिख मारे गए और इन भीषण हत्याओं, बड़े पैमाने पर आगजनी और लूटपाट के संबंध में केवल कुछ मामले दर्ज किए गए।

 
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पीठ ने कहा कि राज्य की ओर से इस पर कोई विवाद नहीं है कि जांच एजेंसियों द्वारा आगे कोई जांच नहीं की गई और कथित अपराधों के संबंध में कोई नई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई है। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि राज्य क्यों या शिकायतकर्ता ने उन आधारों पर अपील दायर नहीं की जो बरी होने के समय भी उपलब्ध थे। एफआईआर में देरी का कारण सही नहीं था। यह स्पष्ट है कि अपील का आधार जो अब उत्तेजित है, वह पूरी तरह से मामले की योग्यता पर है जो मुकदमे और परिणामस्वरूप बरी होने के समय भी मौजूद था।
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