आज भी बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जो बेरोजगार हैं। बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जिनके सिर पर माता-पिता का साया नहीं है। जरा सोचें कि इन लोगों के लिए दिवाली के क्या मायने हैं।
व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि जब तक समाज में हर वर्ग खुशहाल नहीं होगा, तब तक त्योहारों को सेलिब्रेट करने का क्या औचित्य। यह कहना है हरियाणा महिला कल्याण समिति की अध्यक्ष आलोकदीप का।
आलोकदीप लंबे समय तक नेहरू कॉलेज की प्रोफेसर रहीं। इसके बाद सर्व शिक्षा अभियान से जुड़कर जरूरतमंद बच्चों के लिए काम किया। पति कुलदीप फोगाट उच्च शिक्षा विभाग से सेवानिवृत हैं।
मौजूदा समय में रोशनी के त्योहार दिवाली पर भारी पड़ रहे बाजारीकरण पर नाराजगी जाहिर करते हुए आलोकदीप ने बताया कि मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को बनावटी दिवाली पसंद नहीं है। पिछले 20 साल से परिवार के साथ दिवाली पर मिट्टी के दीये और मोमबत्तियां जलाते आ रहे हैं।
कभी भी हमने अपने घर पर झालर या लड़ियां लगाकर दिखावा नहीं किया। दिवाली की शाम विधि-विधान से लक्ष्मी पूजन करते हैं। रिश्तेदार व मिलने वाले लोग उपहार लेकर आते हैं, लेकिन उन उपहारों को जरूरतमंदों में बांटने का प्रचलन चला आ रहा है।
बचपन में पिता के साथ पूरा परिवार एटा के सरस्वती शिशु मंदिर में मिठाई बांटकर सामूहिक रूप से दिवाली मनाई जाती थी। इस बार भी दिवाली गृहविहीन बच्चों के साथ एनआईटी के तिकोना पार्क स्थित राजकीय स्कूल के छात्रावास में मनाने का निर्णय लिया है। दिवाली के उपलक्ष्य में ही 16 नवंबर को 'बेटी उत्सव का आयोजन किया जाएगा। जिसमें उन परिवारों को सम्मानित किया जाएगा, जिनमें दो बेटियां हैं।
संकल्प: जरूरतमंद बच्चों के लिए जितना हो सकेगा, उतना काम करूंगी। सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के लिए काम करती रहूंगी।
संदेश: पर्यावरण को ध्यान में रखकर दिवाली मनाएं। बनावटी रोशनी का बहिष्कार करें। मिट्टी के दीये और मोमबत्तियों का प्रयोग कर अपने साथ दूसरों के त्योहार को भी खुशहाल बनाएं।