हरियाणा में भाजपा की हैट्रिक होगी या फिर कांग्रेस का सूखा खत्म होगा। इसके अलावा यह चुनाव जननायक जनता पार्टी (जेजेपी), इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), हरियाणा लोकहित पार्टी (हलोपा) जैसे छोटे दलों के लिए अस्तित्व का सवाल है।
इस बार बेहद बदली परिस्थितियों में हो रहे हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे कई अहम सवालों का जवाब देंगे। चुनाव में भाजपा के सामने जीत की हैट्रिक लगा कर सत्ता बचाए रखने की चुनौती है तो कांग्रेस के सामने गुटबाजी से ऊपर उठ कर हार का सूखा खत्म करने की।
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इसके अलावा यह चुनाव जननायक जनता पार्टी (जेजेपी), इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), हरियाणा लोकहित पार्टी (हलोपा) जैसे छोटे दलों के लिए अस्तित्व का सवाल है। चंद महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजाई थी। लोकसभा चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद पार्टी ने कांग्रेस के हाथों दस में से पांच सीटें गंवा दीं।
ओबीसी बिरादरी के नए सीएम नायब सिंह सैनी अपनी बिरादरी को साधने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। उन्होंने सभी फसलों को एमएसपी पर खरीदने सहित कई अन्य अहम घोषणा की है। पार्टी अपनी सारी ताकत ओबीसी और अगड़ा वर्ग को साधने में लगा रही है।
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कांग्रेस का जाट-दलित समीकरण पर जोर : लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए उत्साहजनक रहे हैं। पार्टी एक दशक बाद राज्य की दस में से पांच सीटें जीती। हालांकि नतीजे के बाद से ही पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। एक तरफ सैलजा गुट है तो दूसरी ओर भूपेंद्र हुड्डा गुट।
गुटबाजी के कारण कांग्रेस ने किसी को चेहरा बनाने से परहेज बरता है। पार्टी की रणनीति 22 फीसदी जाट और 21 फीसदी दलित मतदाताओं को साधे रखने की है।
लगातार बढ़ रही भाजपा की चुनौती
2014 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा हरियाणा में कभी बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं रही। भाजपा में मोदी युग के आगाज के बाद पार्टी पहली बार इसी साल अपने दम पर बहुमत हासिल कर सरकार बनाने में सफल रही।
बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत से चूकी और उसे सरकार बनाने के लिए जेजेपी का सहारा लेना पड़ा। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के हाथों पांच सीटें गंवानी पड़ी।
जेजेपी-इनेलो के लिए करो या मरो का सवाल
बीते चुनाव में जेजेपी 10 सीटें जीतकर किंगमेकर बनकर उभरी थी। जेजेपी मुखिया दुष्यंत चौटाला देवीलाल की विरासत पर खरे उतरने में सफल रहे थे। हालांकि भाजपा से गठबंधन और टूटने के क्रम में पार्टी में अंतर्विरोध चरम पर है। वहीं, इनेलो पिछले चुनावों में प्रभाव छोड़ने में असफल रही है।
जातीय गाणित
राज्य में जाट 22 फीसदी
दलित 21 फीसदी
ओबीसी 30 फीसदी
ब्राह्मण 8 प्रतिशत
वैश्य 5 फीसदी
पंजाबी 8 फीसदी
राजपूत 3.5 फीसदी
किसका खेल बिगाड़ेगा बसपा-इनेलो गठबंधन?
विधानसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से पहले ही बसपा और इनेलो ने चुनाव पूर्व गठबंधन की घोषणा कर दी थी। बसपा को राज्य के कुछ क्षेत्रों के दलित मतदाताओं में तो इनेलो का कुछ क्षेत्र की जाट बिरादरी पर असर है।
कांग्रेस की रणनीति इन दोनों वोट बैंक को अपने साथ जोडऩे की है। ऐसे में अगर इनेलो-बसपा गठबंधन ने कमाल दिखाया तो इसका नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। गौरतलब है कि बसपा राज्य की 37 तो इनेलो 53 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।