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'एक महिला' की खातिर CVO को हटाया!

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के इंडोक्रिनोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष रहीं डॉक्टर एसी अमिनी के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करने के बाद सीवीओ ने सख्त विभागीय कार्रवाई करने की अनुमति मांगी थी।
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सीबीआई ने भी प्राथमिक जांच में पाया था कि आरोपी चिकित्सक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। एम्स चेयरमैन (स्वास्थ्य मंत्री) ने विभागीय कार्रवाई की अनुमति नहीं दी और डॉक्टर को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। आरोपी डॉक्टर भाजपा की एक बड़ी नेता का इलाज करती थीं। जून में ही वे रिटायर हो चुकी हैं।

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की ओर से डॉ. एसी अमिनी को दक्षिण भारत स्थित विनायक मिशन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का निरीक्षण करने गईं थीं। एमसीआई के नियमानुसार उस कॉलेज से किसी तरह की सहायता नहीं लेनी होती है।
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लेकिन डॉ. अमिनी ने उस मेडिकल कॉलेज से खाने-पीने और रहने की व्यवस्था करवाई। इसके लिए मेडिकल कॉलेज की ओर से पेमेंट किया गया। एमसीआई के नियमों के अनुसार यह पूरी तरह से गलत था।

एम्स के तत्कालीन सीवीओ संजीव चतुर्वेदी ने जांच-पड़ताल के बाद मेजर पेनाल्टी के चार्ज के लिए बतौर एम्स चेयरमैन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से स्वीकृति मांगी। लेकिन स्वास्थ्य मंत्री ने जांच-पड़ताल के बाद यह कहते हुए मामले को बंद करने के आदेश दे दिए कि आरोपी डॉक्टर ने कॉलेज का किसी तरह से पक्ष नहीं लिया।

स्वास्थ्य मंत्री ने अपने आदेश में डॉ. अमिनी को यह भी सलाह दी कि भविष्य में ऐसे मामलों बचें। 30 जून को यह आदेश जारी किया गया और उसी माह वे सेवानिवृत हुईं।

सीवीओ को नाकाबिल बता अपनी काबलियत पर उठाया सवाल

स्वास्थ्य मंत्रालय ने एम्स के मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) संजीव चुतर्वेदी को उनके पद से यह कहते हुए हटा दिया गया कि वे इस पद के योग्य नहीं थे। लेकिन, मंत्रालय के इस फैसले ने स्वास्थ्य सचिव के ही दो आदेशों को विरोधाभासी साबित कर दिया है।

मई में स्वास्थ्य सचिव ने एम्स के सीवीओ की नियुक्ति को पूरी तरह से कानूनी और सही बताया था और अब उन्हें इस पद के लिए नाकाबिल बताया जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव लव वर्मा और संयुक्त सचिव डॉ. विश्वास मेहता के हस्ताक्षर से 23 मई 2014 को जारी आदेश में कहा गया था कि एम्स के सीवीओ पद पर संजीव की नियुक्ति नियम-कानून के तहत की गई है।

नियुक्ति में किसी नियम की अनदेखी नहीं हुई है। मंत्रालय के अधिकारियों ने सीवीसी को बताया था कि विजलेंस मैन्युअल के चैप्टर-2 के अनुसार, उप सचिव पद के अधिकारी को सीवीओ बनाया जा सकता है। यही नहीं एम्स का नाम उस सूची में भी नहीं है जिसके अनुसार यहां सीवीओ नियुक्त करने के पहले सीवीसी से स्वीकृति की जरूरत है, क्योंकि एम्स पार्लियामेंट एक्ट से बना एक स्वायत्त चिकित्सा और शोध संस्थान है।

यहां कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं होती। यही नहीं सीवीसी एक्ट-2003 के मुताबिक, केंद्रीय सतर्कता आयोग की भूमिका सिर्फ सलाहकार की होती है, सीवीसी का नीतिगत फैसलों में कोई दखल नहीं होता। डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, नर्सिंग काउंसिल, फार्मेसी काउंसिल और दूसरी संस्थाओं में सीवीओ नहीं हैं, लेकिन उस ओर किसी का ध्यान नहीं गया।
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एम्स के डॉक्टरों सहित खेमका भी आए समर्थन में

अपनी ईमानदारी से भ्रष्टाचारियों को हिला कर रख देने वाले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का भी समर्थन संजीव को मिला है। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने फोन कर संजीव की हौसलाअफजाई की है।

डॉक्टरों ने चलाया हस्ताक्षर अभियान
चतुर्वेदी के समर्थन में अस्पताल के चिकित्सक और कर्मचारी खुलकर सामने आ गए हैं। सीवीओ को हटाने के खिलाफ डॉक्टर हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।

अभी तक 50 से अधिक चिकित्सकों ने हस्ताक्षर किए हैं और मंत्रालय के फैसले को गलत बताया है। एम्स फैकल्टी एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर मनोज सिंह ने संजीव को हटाने को गैरकानूनी बताया है।
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