सफदरजंग अस्पताल के डॉ. मनीष का कहना है कि जनसंख्या का तेजी से बढ़ना भारत को सामाजिक, आर्थिक दोनों ही क्षेत्रों में पछाड़ रहा है। नसबंदी पर जागरूकता की बेहद कमी है। वहीं सरकारी स्वास्थ्य तंत्र भी इसे लेकर बहुत चुस्त नहीं है। खासतौर पर पुरुषों की नसबंदी को लेकर फैली सामाजिक भ्रांतियों का दुष्प्रभाव पूरे देश में है। इसके पीछे के कारणों पर भी विचार जरूरी है। लोकनायक अस्पताल के डॉ. विनोद का कहना है कि धार्मिक व राजनैतिक विचारों से ऊपर उठकर सरकार को विदेशों की भांति ठोस निर्णय लेने चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें दुनिया के बाकी हिस्सों से भी सबक लेना चाहिए।
2018 में केवल दो पुरुषों ने कराई नसबंदी
नपुंसकता के डर के कारण पुरुष नसबंदी के लिए आगे नहीं आते जबकि ये महज भ्रांति से बढ़कर कुछ नहीं है। बृहस्पतिवार को नई दिल्ली स्थित आरएमएल अस्पताल में आयोजित कार्यक्रम में डॉक्टरों के अनुसार पुरुषों में नसबंदी को लेकर जागरूकता मंद गति बढ़ रही है। भ्रांतियों पर भरोसा करने के कारण पुरुष नसबंदी से भागते हैं।
आरएमएल अस्पताल ही में साल 2018 में 2 पुरुषों ने नसबंदी कराई जबकि 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 8 हुआ। फिलहाल इस साल में दो पुरुष अब तक नसबंदी करा चुके हैं। परिवार नियोजन विभाग की डॉ. अनीता वर्मा ने कहा कि यह हमारे सामने बड़ी चुनौती है कि पुरुष नसबंदी के लिए आगे आएं। इसके लिए हमने पुरुष काउंसलर भी रखे हैं। पिछले सालों में पुरुष नसबंदी की संख्या अस्पताल में बढ़ी है। नसबंदी के बाद न तो पुरुषों में कोई कमजोरी आती है और न ही उन्हें नपुंसकता का शिकार होना पड़ता है।