अभिभावकों का आरोप, शिक्षा विभाग का कुंभकर्णी निद्रा सोया रहना ही आम लोगों को लूटने को मजबूर कर रहा
शिक्षा विभाग को मामले से अवगत, मगर नहीं हो रही इन स्कूलों पर कार्रवाई
संवाद न्यूज एजेंसी
पुन्हाना। शिक्षा विभाग के सख्त आदेश के बाद भी क्षेत्र में चल रहे निजी स्कूलों की मनमानी रुकने का नाम नहीं ले रही है। स्कूलों में चल रही किताबों की दुकानों को लेकर स्थानीय शिक्षा विभाग बिल्कुल भी गंभीर नहीं है, जिसका खामियाजा ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के अभिभावकों को उठाना पड़ रहा है। विभाग के सुस्त रवैये के कारण शिक्षा के मंदिर में किताब बेचने का कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है।
निजी स्कूलों का यह धंधा कोई नया नहीं है, बल्कि पिछले कई सालों से किताबों, स्टेशनरी और वर्दी के नाम पर लूट का धंधा स्कूल प्रांगण में हीं चलाया हुआ है। हालांकि, हर बार इन किताबों को लेकर अभिभावकों द्वारा आवाज भी उठाई जाती है, लेकिन शिक्षा विभाग के सुस्त और लापरवाह कार्य प्रणाली के कारण कभी ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। लोगों का कहना है कि निजी स्कूलों की शिक्षा विभाग के अधिकारियों से भी खुली सांठ-गांठ है। इस कारण कभी ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
ललित कुमार, रामकुमार, राजू, भारत भूषण, मनोज, मनीष, असलम, नरेन्द्र, सुनील कुमार आदि लोगों का कहना है कि पुन्हाना शहर सहित आसपास के गांवों में भारी संख्या में निजी स्कूल खुले हुए हैं जो शिक्षा विभाग के नियमों को ताक पर रख कर जमकर अपनी मनमानी चलाए हुए है। ऐसे स्कूल अभिभावकों को स्कूल परिसर से ही किताबें, जूते वर्दी सहित स्टेशनरी का सामान खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं। उक्त लोगों का कहना है कि निजी प्रकाशकों की 50 से 60 रुपये में आने वाली किताबें स्कूल में दस गुणा अधिक दामों में दी जाती हैं। यहां तक की स्कूल के नाम से छपी कॉपियां भी दो से तीन गुणा दामों पर दी जाती हैं। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग का कुंभकर्णी निद्रा सोया रहना ही आम नागरिकों को निजी स्कूलों द्वारा लूटने को मजबूर कर रहा है। लोगों ने जिला प्रशासन से ऐसे निजी स्कूलों की समय समय पर जांच की मांग की है ताकि आमजन इनके लूटने से बच सके।
पुन्हाना, घीडा, बीसरू, बिछोर सहित अन्य गावों में चल रहे ऐसे स्कूलों को शिक्षा विभाग की कार्रवाई का बिल्कुल भी डर नहीं है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल दाखिला के समय खरीदी जाने वाले प्रति छात्र की किताब चार से पांच हजार रुपये की होती है, जबकि हर साल बदलने वाले मनमाने नियम के कारण उन किताबों की कीमत सौ से ड़ेढ सौ रह जाती है। उनका कहना है कि यदि हर साल किताब बदलने का नियम भी ना हो तो वही किताबें दूसरे छात्रों के काम भी आ सकती हैं।
अभिभावकों का कहना है कि मनमाने प्रकाशन की किताबों पर स्कूलों द्वारा महंगे दाम प्रकाशित कराए हुए हैं। चालीस से पचास रुपये वाली किताब पर दस गुणा यानी चार सौ से पांच सौ रुपये प्रकाशित किए हुए हैं। इतना हीं नहीं स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान या स्कूल प्रांगण से ही खरीदना अनिवार्य है, जिससे साफ प्रतीत होता है कि किताब विक्रेता से उनकी पूरी सांठगांठ है। सूत्र बताते है कि निजी स्कूलों की मनमानी किताब बेचने के लिए स्कूल संचालक द्वारा महंगी कीमत वसूली जाती है, तभी चुनिंदा दुकानों पर हीं उनकी किताबें मिलती हैं।
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ऐसे स्कूलों की जांच की जा रही है, जल्द ही इन्हें चिन्हित कर विभाग द्वारा कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। - वीरेन्द्र गुप्ता, खंड शिक्षा अधिकारी पुन्हाना।