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Gurugram News: मेवाती घुड़सवारों से डरते थे अंग्रेज, आज खस्ताहाल हैं उनके स्मारक

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1857 की जंग-ए-आजादी में हजारों मेवातियों ने दी थी शहादत
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13 नवंबर 1857 को सैंकड़ों मेवाती चढ़े थे फांसी



ब्रिगेडियर जनरल सावंत ने लिखा, उन्हें हर समय मेवाती घुड़सवारों का सताता है डर



कैप्शन - नगीना शहीदी मीनार पर लिखे नाम व खस्ताहाल महूं मीनार



राजूददीन जंग

नगीना। मेवात का अतीत काफी गौरवशाली रहा है। इस इलाके का इतिहास खंगालते हैं तो पता चलता है कि यहां के हजारों क्रांतिकारियों ने 1857 की जंग-ए-आजादी में शहादत दी थी। फिर भी यहां भेदभाव की काली परछाई इलाके का पीछा नहीं छोड़ रही है। इन्हीं शहीदों की याद में नूंह जिला मुख्यालय से लेकर अलवर बॉर्डर के आखिरी गांव दोहा में शहीदी मीनारें बनी हुई हैं। इनके रखरखाव को लेकर स्थानीय प्रशासन गंभीर दिखाई नहीं देता है। हालांकि, कुछ साल पहले इनकी मरम्मत का कार्य जरूर हुआ था। उसके बावजूद गांव महूं में बनी मीनार की ऊपरी सतह खराब होती जा रही है। मेरठ और दिल्ली के बाद मेवात के गांव नगीना, रायसीना, शाहपुर नंगली और सोहना के आसपास 13 नवंबर 1857 में सबसे ज्यादा जान-माल का नुकसान हुआ था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली बार एकजुटता के साथ 10 मई 1857 को उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बाद मेवात क्षेत्र लड़ाई का केंद्र बिंदु रहा था। सुलगी चिंगारी मेवात पहुंचते-पहुंचते शोला बन गई। तब गुड़गांव-मेवात की आबादी 1 लाख 10 हजार थी और 30 प्रतिशत जमीनों पर मेवातियों का कब्जा था। यहां का इतिहास इस तरह की अनगिनत वीर गाथाओं से भरा पड़ा है लेकिन उसे इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिल सकी जिस का यह इलाका हकदार था।



हजारों मेवाती हुए शहीद



मेवातियों ने उस समय 7 युद्ध लड़े जिसमें नूंह, घासेड़ा, रायसीना, तावडू, खोरी, रुपडाका, महूं, घागस-कंसाली इत्यादि शामिल है। आमने-सामने की लड़ाई में मेवात के 1056 क्रांतिकारी शहीद हुए थे, जिनको अलग से फांसी दी गई, उनका रिकॉर्ड अलग है। कुल मिलाकर हजारों ने इस लड़ाई में शहीद हुए थे। सन 1857 में मेवातियों की हिम्मत देखकर ब्रिगेडियर जनरल सावंत ने लिखा था कि मेवाती घुड़सवारों का डर उन्हें हर समय सताता है, हर मोर्चे पर मेवाती वीरों ने उन्हें कड़ी टक्कर दी है।
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शहीदी मीनार खस्ताहाल
गांव महूं, दोहा, फिरोजपुर झिरका मीनार की हालत खस्ता है, यहां अवैध कब्जे भी किया जा रहे हैं। शहीदों की याद में शहीद पार्क नूंह समेत 13 जगहों पर मीनारों का निर्माण होना था जिसमें से 2 अधूरी समेत दो नहीं बन सकी थीं। नूंह पार्क में शहीदों के सम्मान में न केवल 100 फुट ऊंचा तिरंगा लहरा रहा है बल्कि उन शहीदों के गांवों और नामों का यहां वर्णन किया गया है जिससे युवा पीढ़ी अपने इतिहास के बारे में जागरूक रह सके।



वीर शहीदों की याद में न केवल गांव रूपडाका में एक आलीशान मीनार बनी हुई हैं। भूतपूर्व राज्यपाल डॉ. एआर किदवई के समय में मेवात के बहुत से गांवों में शहीदी मीनारों का निर्माण कराया गया।
सुबोध कुमार जैन, उपाध्यक्ष अखिल भारतीय शहीदाने सभा



फिरोजपुर नमक, शाहपुर नंगली, खोरी, नूंह, अड़बर गांव के क्रांतिकारी 1857 की क्रांति में हिस्सा लिया था। इसके अलावा मेवाती महीनों लड़ते रहे और इसी लड़ाई में अंग्रेज अधिकारी मारे गए थे। मेवातियों ने उस समय अंग्रेजी फौज का पूरी तरह से सफाया कर दिया था।
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सिद्दीक अहमद मेव, इतिहासकार नूंह



शहीदी स्मारकों के रखरखाव की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है, उन्हें देखना चाहिए कि कोई अवैध कब्जा तो नहीं है। मरम्मत की आवश्यकता है तो वह पंचायत फंड से कर दें। कब्जा नहीं हटाता है तो मुझे लिखित में दें मैं तुरंत कार्रवाई करूंगा।

सुरजीत सिंह, खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी नगीना
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