अरावली में हर रोज खनन हो रहा है। जगह-जगह टूटे पहाड़ चीख-चीख कर खनन की दास्तां बयां कर रहे हैं। अरावली मैं खनन एक तरह से सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देना भी है। अमर उजाला की टीम ने बुधवार को पचगांव सहित आसपास के क्षेत्र में पहुंची तो खनन से छलनी हुआ अरावली का सीना साफ नजर आया। जगह-जगह टूटे पहाड़, बिखरे पत्थर और बड़े वाहनों ( डंपर, ट्रैक्टर ट्रॉली) के लिए बने रास्ते साफ संकेत कर रहे हैं कि खनन माफिया किस तरह सक्रिय हैं। इतना तब है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 2005 से अरावली में खनन बंद करने के आदेश दे रखे हैं। डीएसपी हत्याकांड के बाद खनन की पाबंदी पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक अरावली का यह हाल कोई एक-दो दिन, महीने, दो महीने के भीतर नहीं हुआ। बरसों से अवैध खनन का कारोबार धड़ल्ले से जारी है। इसके लिए केवल खनन माफिया ही जिम्मेदार नहीं हैं। प्रशासनिक अमले से लेकर पुलिस और हर वह विभाग जिम्मेदार है, जिसके कंधे पर अरावली बचाने और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी है।
अरावली में खनन माफिया की सक्रियता देखते हुए वर्ष 2014 में सरकार की ओर से आईआरबी के 700 जवानों की तैनाती का फैसला हुआ था। उस समय ऐसा लगने लगा था कि अब पहाड़ से माफियाराज खत्म हो जाएगा। प्रशासन और पुलिस के साथ-साथ खनन निगरानी के लिए विशेष तौर पर खनन विभाग और वन विभाग की खास जिम्मेदारी होती है। सभी विभागों की ओर से कागजों में तो बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर खनन रोकने का कोई प्रयास नजर नहीं आता। 700 जवानों की तैनाती के मामले में भी ऐसा ही हुआ। सरकार की घोषणा से संबंधित यह योजना सिर्फ फाइलों में ही दबकर रह गई। जानकारों की माने तो विभागों और अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण ही खनन माफिया दबंग हो गया है।