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विकास कार्यों संबंधी अधिकार देने के मुद्दे पर रार

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गुरुग्राम। नगर निगम के निचले स्तर के अधिकारियों को छोटे विकास कार्यों की मंजूरी दिए जाने संबंधी अधिकारों को लेकर पार्षद व निगमायुक्त आमने-सामने आ गए हैं। निगम पार्षद कनिष्ठ अधिकारियों को विकास कार्यों की मंजूरी संबंधी अधिकार दिलाने के लिए विधायक व मेयर के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं तो वहीं निगम आयुक्त मुकेश कुमार का कहना है कि नगर निगम में पहले से ही यह व्यवस्था लागू है।
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दरअसल नगर निगम पार्षद पिछले काफी समय से छोटे व कम धनराशि के विकास कार्यों को कराने के लिए संयुक्त आयुक्तों, अभियंताओं समेत निगम के निचले स्तर के अन्य अधिकारियों को अधिकार देने की मांग कर रहे हैं।
अब तक यह व्यवस्था है कि निगम की तरफ से कराए जाने वाले सभी छोटे-बड़े कार्य नगर निगम आयुक्त की अनुमति से ही होते हैं। इस बारे में पूछने पर निगम आयुक्त ने दो टूक कहा कि छोटे विकास कार्यों को कराने के लिए पहले ही संयुक्त आयुक्तों समेत निगम के निचले स्तर के अन्य अधिकारियों को अनुमति दी जा चुकी है और इसी व्यवस्था के तहत काम हो रहा है। वहीं, पार्षद ऐसी कोई व्यवस्था होने से इनकार कर रहे हैं।
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इसलिए अहम है मुद्दा
यह मुद्दा इस समय इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि मानसून व बारिश के दौरान निगम प्रशासन से लोग नालों के स्लैब, ढक्कनों, सीवर सफाई समेत अन्य कार्यों के समय पर किए जाने की अपेक्षा करते हैं। ऐसा न होने के कारण ही शहर थोड़ी सी बारिश में भी तालाब बन जाता है। इन कार्यों के लिए सबसे पहले लोग स्थानीय पार्षदों व अन्य जनप्रतिनिधियों के पास जाते हैं। ऐसे में पार्षद छोटे व बुनियादी विकास कार्यों को जल्द से जल्द कराने के लिए पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग कर रहे हैं। यह तभी संभव होगा जब विकास कार्य जल्दी स्वीकृत होंगे और इसके लिए संयुक्त आयुक्तों, कार्यकारी अभियंता, कनिष्ठ अभियंताओं समेत निचले स्तर तक अधिकारियों को कार्य की मंजूरी देने का अधिकार दिया जाएगा।
अभी निगमायुक्त ही सर्वेसर्वा
पार्षदों का कहना है कि अभी तक सभी तरह के विकास कार्य निगमायुक्त के द्वारा ही स्वीकृत किए जा रहे हैं। ऐसे में महीनों तक फाइल अधिकारियों की टेबल पर ही घूमती रहती है। स्थिति यह है कि अगर नालों के स्लैब भी रखवाना होता है तो उसके लिए नए सिरे से टेंडर निकाला जाता है और इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है और इस लेटलतीफी में नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।
बेवजह भरी जाती है ठेकेदारों की जेब
खास बात यह भी है कि छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी टेंडर निकालकर बेवजह ठेकेदारों की जेबें भरी जाती हैं तो वहीं इससे निगम को राजस्व क्षति भी होती है। इस बारे में पूछने पर एक निगम पार्षद ने बताया कि जो स्लैब व ढक्कन बाजार में 500 रुपये में उपलब्ध होेते हैं, उन्हें ही टेंडर निकालकर 5 हजार रुपये में लगवाया जाता है और यह सारा पैसा ठेकेदारों की जेब में जाता है।
पार्षदों की नहीं हो रही सुनवाई
मेयर मधु आजाद भले ही अधिकारियों को विकास कार्यों में पार्षदों से राय-परामर्श करने के निर्देश देती हों लेकिन सच्चाई यह है कि नगर निगम में इस समय अफरशाही हावी है। कई निगम पार्षदों का कहना है कि उनकी कहीं नहीं सुनी जा रही है। एक पार्षद ने तो बताया कि 5 हजार करोड़ रुपये की आय की योजना बनाई जाती है, अगर 500 करोड़ भी खर्च कर दिए जाएं तो शहर का कायाकल्प हो जाएगा। मालूम हो कि मानसून से पहले निगम के कई पार्षदों ने अधिकारियों से अपने-अपने इलाके में सीवर सफाई का अनुरोध किया था लेकिन कहीं पर भी काम नहीं किया गया।
छोटे कार्यों के लिए संयुक्त आयुक्त समेत निचले स्तर के अधिकारियों को शक्तियां दे दी जाएं तो विकास कार्य जल्द पूरे होंगे। पिछले दिनों बैठक के दौरान मेयर व विधायक के समक्ष यह मुद्दा उठाया था लेकिन कमिश्नर की गैरमौजूदगी के कारण इस पर ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी थी।
- ब्रह्म यादव, निगम पार्षद
जल्द विकास कराने के लिए कार्य के जल्द स्वीकृत किया जाना भी आवश्यक होता है। ऐसे में जेसी, जेई, समेत निचले स्तर के अधिकारियों को इसका अधिकार मिलेगा तो उसका लाभ जनता को ही मिलेगा, जिसके लिए हम प्रयासरत हैं।
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- अश्वनी यादव, निगम पार्षद
शहर में विकास संबंधी छोटे कार्यों को कराने के लिए पहले से ही कनिष्ठ अधिकारियों को अधिकार दिए गए हैं। अधिकारियों के स्तर से काम कराए भी जा रहे हैं।
- मुकेश कुमार आहुजा, नगर निगम आयुक्त गुरुग्राम।
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