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आरक्षण कानून नहीं बदला तो पलायन कर जाएंगी गारमेंट्स इंडस्ट्री

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गुरुग्राम। हरियाणा के लोगों को प्राइवेट कंपनियों में 75 फीसदी नौकरी देने वाला कानून गारमेंट्स इंडस्ट्री के सामने मुसीबत पैदा करने वाला है। इनमें बनने वाले कपड़े यूके, अमेरिका सहित कई देशों में एक्सपोर्ट होते हैं और साल में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक का टर्नओवर है। जिनमें 80 फीसदी से अधिक कर्मचारी तो सिलाई की मशीन चलाकर कपड़े तैयार करने वाले हैं। उद्यमियों का सवाल है कि हरियाणा में इस तरह के प्रशिक्षित कर्मचारी ही नहीं हैं, जबकि दूसरे प्रदेशों के कर्मचारियों के काम करने पर रोक रहेगी। ऐसे में अपनी इन इंडस्ट्री को दूसरे राज्यों में पलायन करने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं रहेगा।
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गारमेंट्स इंडस्ट्री में 80 फीसदी से अधिक कर्मचारी टेलरिंग का काम करने वाले हैं। जिसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखंड के युवक और युवतियां करते हैं। सिलाई के इस काम में करीब 40 फीसदी महिलाएं होती हैं। जो कि सिलाई में एक्सपर्ट हैं। इनके अलावा उनकी काम करने की क्षमता भी अधिक होती है। सरकार को चाहिए कि पहले युवाओं को इस तरह के कामों के लिए प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करें। साथ ही ऐसा माहौल बने कि यहां की महिलाएं सिलाई के काम में रुचि लें। तब तक इस कानून में आरक्षण की अनिवार्यता के स्थान पर प्राथमिकता रखी जाए। वास्तविकता यह भी है कि यहां के परिवारों में इस तरह के काम के लिए महिलाएं भी बहुत कम हैं। यहां तक कि अधिकांश परिवारों से महिलाओं को काम करने के लिए नहीं भेजा जाता है।
उद्यमियों का कहना है कि फैक्ट्री व उद्योग हरियाणा में स्थापित हैं, जबकि काम करने वाले एक्सपर्ट कर्मचारी दूसरे राज्यों के हैं। आरक्षण कानून लागू होने से स्थानीय स्तर पर अनुभवी कर्मचारियों को यहां पर काम कराना मुश्किल हुआ, तो मजबूरी में इस इंडस्ट्री के लिए दूसरे ऐसे राज्य की तलाश करनी होगी, जहां सुविधाएं हों। क्योंकि ऐसे कर्मचारी तो दूसरी जगह पर भी काम करने के लिए आसानी से शिफ्ट हो सकते हैं। उनके लिए तो जैसा हरियाणा, वैसे ही दूसरे राज्य रहेेंगे।
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गुरुग्राम जिले में गारमेंट्स की करीब 250 इंडस्ट्री बताई जा रहीं हैं। इनमें से मानेसर में 150 इंडस्ट्री हैं, जहां पर करीब 15 हजार कर्मचारी काम करते हैं। इनमें से 12 हजार कर्मचारी तो दूसरे राज्यों के सिलाई करने वाले कारीगर हैं। इनके अलावा गुुरुग्राम के झाड़सा सहित कई इलाकों में 100 इंडस्ट्री हैं, जिनमें करीब 10 हजार कर्मचारी काम करते हैं। इनमें उत्पादित होने वाले 90 फीसदी सूती और पॉलिस्टर के कपड़े निर्यात होते हैं। जिनसे सरकार को एक हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा ही मिलती है।
वर्जन-
गारमेंट इंडस्ट्री में 80 फीसदी स्टाफ कपड़ों की सिलाई करने वाला है। 20 फीसदी स्टाफ पैकिंग, सुपरविजन व अन्य काम करने वाले हैं। हरियाणा में सिलाई करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। ऐसे में दूसरे प्रदेशों से कर्मचारी नहीं होंगे, तो हमारी इंडस्ट्री कैसे चलेगी। - मुनेश त्यागी, जेडीएम ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड व वाइस प्रेसिडेंट, आईएमटी इंडस्ट्रियल एसोसिएशन मानेसर
हरियाणा में सिलाई करने वाले कारीगर होंगे नहीं। दूसरे शहरों से लेेंगे नहीं। ऐसे में सरकार हरियाणा के लोगों को नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण की अनिवार्यता उद्योगों को बंद करने वाली साबित होगी। इन परिस्थितियों में इंडस्ट्री के पलायन के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। - सतीश चंद्र, एमडी. स्प्रिंग ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड
15 साल पहले यूपी के कानपुर जिले में उद्योगों के लायक माहौल न होने पर मानेसर में गारमेंट्स इंडस्ट्री शिफ्ट की थी। यहां पर भी आरक्षण की अनिवार्यता जैसे कानून के कारण मुश्किल हो सकती है। सरकार से अनुरोध है कि आरक्षण की अनिवार्यता को समाप्त करें। जिससे कि यहां पर उद्योगों के लिए अच्छा माहौल बन सके। - अरुण कोंडिया, एमडी, सिल्कन फैब
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