गुरुग्राम। लगातार बढ़ती आबादी के बीच महज 10 इंच की सीवर लाइन पर शहर के बड़े हिस्से की जलनिकासी का भार है। सुनने में भले ही अटपटा लगे, लेकिन विश्व स्तर का दर्जा प्राप्त इस शहर की जमीनी हकीकत यही है। बरसात के दौरान एकदम से हजारों गैलन पानी भला 10 इंच की लाइन कैसे झेले, यह सवाल अब हर शहरवासी को करना होगा, क्योंकि ठोस प्रबंध करने की बजाय शहर वासियों को भ्रमित किया जा रहा है। वर्षों से यहां यही खेल किया जा रहा है। मूल कारणों का पता होने के बाद भी समस्या को जड़ से खत्म करने में शासन और प्रशासन की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती।
शहर के सबसे पुराने हिस्से (जिसमें 48 से अधिक कॉलोनियां और शहर के बड़े सेक्टर शामिल हैं) की सीवर लाइनें 10 इंच की सीवर लाइन से जोड़ी गई हैं। इस क्षमता की सीवर लाइन के जरिये ही शहर का सीवर बसई ट्रीटमेंट प्लांट तक भेजा जा रहा है। इसका खुलासा एक वरिष्ठ पार्षद सुभाष सिंगला ने खुद किया है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को पता है कि समस्या की असली जड़ कहां है, कई बार निगम सदन की बैठक में इस मुद्दे को उठाया भी गया लेकिन मुद्दा हर बार बहस का विषय ही बनकर रह गया।
चार हिस्सों में बंटा है शहर
गुरुग्राम चार हिस्सों में बंटा है। रेलवे लाइन के उस पार, हाईवे और रेलवे लाइन के बीच का हिस्सा, हाईवे के पार और द्वारका एक्सप्रेसवे के पार का हिस्सा। सबसे अधिक दिक्कत हाईवे और रेलवे लाइन के बीच के हिस्से में आती है। यही मूल शहर या कहें कि पुराना शहर भी है, यहीं पर दशकों पुरानी व्यवस्थाओं को ढोया जा रहा है, जबकि बाकी हिस्से बाद में विकसित हुए हैं तो उनमें व्यवस्थाएं काम-चलाऊ हैं।
नीचा है ट्रीटमेंट प्लांट
शहर का पूरा ढाल राजीव चौक से लेकर रेलवे रोड से बसई की ओर है, यानी जहां सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बना है वह हिस्सा नीचे है और शहर पांच से सात फुट ऊपरी हिस्से पर बसा है। जब तक मोटर चलती है, प्लांट में सीवर का पानी आता है, बंद होते ही वह पानी पूरे शहर में बैक मारता है। बरसात के दौरान भी यही हाल होता है।
कबीर भवन चौक पर मिलती है लाइन
नगर परिषद के पूर्व प्रधान एवं वर्तमान में नगर निगम पार्षद सुभाष सिंगला के अनुसार, ओल्ड रेलवे रोड पर कबीर भवन चौक पर 14 फुट की गहराई पर 40 साल पुराना पाइंट है। शहर के बड़े हिस्से, जिसमें राजीव चौक से कबीर भवन चौक के बीच और आसपास की कॉलोनियां और सेक्टर शामिल हैं, ट्रीटमेंट प्लांट को जा रही सीवर लाइन में मिलती है। न्यू कॉलोनी के अगले पाइंट पर इसमें और कई कॉलोनियों की लाइनें मिलती हैं। यहां से आगे इसी कॉलोनियों और सेक्टरों की लाइनें इस 10 इंच की मुख्य लाइन में जुड़ती चली जाती हैं। बरसात के मौसम के अधिक दबाव और क्षमता कम होने के कारण पानी बैक मारता है। यही कारण है कि इन कॉलोनियों, सेक्टरों और आसपास की मुख्य सड़कों, चौक-चौराहों पर भयंकर जलभराव होता है। कई बार इस लाइन को तीन से चार फुट तक करने की मांग की चुकी है, लेकिन अधिकारी गंभीर ही नहीं होते।
ये सेक्टर और कॉलोनियां हैं प्रमुख
पटेल नगर, कीर्ति नगर, फ्रेंड्स कॉलोनी, सेक्टर-15 पार्ट-1, पार्ट-2, सेक्टर-14, सेक्टर-17, 17 ए, बर्फ खाना, ट्रंक मार्केट, सदर बाजार, नई बस्ती, जैकबपुरा, दयानंद कॉलोनी, आचार्य पुरी, भीम नगर, बलदेव नगर, कृष्ण कॉलोनी, ज्योति पार्क, मदन पुरी, अर्जुन नगर, गुड़गांव गांव, शिवाजी नगर, ओम नगर, शिव कॉलोनी, चार-आठ मरला, लक्ष्मी नगर सहित करीब 48 कॉलोनियां और सेक्टर।
जोहड़ और प्राकृतिक नाले हो गए खत्म
प्रमुख पर्यावरणविद् शरद गोयल के अनुसार, शहर में मौजूद 40 से अधिक जोहड़ और प्राकृतिक नाले अतिक्रमण-कब्जे की भेंट चढ़ गए या विकास के नाम पर उनका अस्तित्व ही खत्म कर दिया गया। पूरे शहर में कहीं भी तकनीकी तौर पर मजबूत रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है। अगर होते तो सोमवार को लघु सचिवालय, नेहरू स्टेडियम, डीटीपी विभाग सहित दूसरे सरकारी दफ्तरों में पानी जमा नहीं होता, यह महज खाना पूर्ति के लिए बनाए गए हैं। यहां का सिस्टम मजबूत करना होगा। जोहड़ों का पुनर्निर्माण करना होगा। मुख्य सीवर लाइन की क्षमता बढ़ानी होगी। प्रशासन चाहे तो एक सप्ताह में समस्या दुरुस्त हो जाए, लेकिन यहां दृढ़ इच्छाशक्ति छोड़िए, दिलचस्पी तक दिखाई नहीं देती।