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परियोजना बैंक में गिरवी है तो भी सुरक्षित रहेगा खरीदारों का पैसा

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परियोजना बैंक में गिरवी है तो भी सुरक्षित रहेगा खरीदारों का पैसा
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- एक खरीदार की याचिका पर हरेरा ने लिया निर्णय
- परियोजना का अधिग्रहण करने वाली वित्तीय संस्था भी खरीदारों के प्रति होगी उत्तरदायी
अमर उजाला ब्यूरो
गुरुग्राम। निर्माण कार्य पूरा करने के लिए बैंकों में गिरवी रखी गईं भवन निर्माण परियोजनाओं का ऋण जमा नहीं होने की स्थिति में भी खरीदारों का पैसा सुरक्षित रहेगा। हरियाणा भू संपदा विनियामक प्राधिकरण (हरेरा) ने खरीदारों के हितों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है। हरेरा के अध्यक्ष केके खंडेलवाल ने शुक्रवार को बताया कि गिरवी रखे गए प्रोजेक्ट के कर्ज की समय पर अदायगी न होने के बावजूद निवेशकों का हित प्रभावित नहीं होगा।
लोक निर्माण विश्राम गृह में प्रेसवार्ता में खंडेलवाल ने बताया कि भवन निर्माण परियोजना (रिअल एस्टेट प्रोजेक्ट) व खरीदारों से ली गई धनराशि को गिरवी रखने की स्थिति में बैंक अथवा वित्तीय संस्था भी प्रमोटर की परिभाषा में आएंगे तथा वह भी निवेशकों के प्रति उत्तरदायी होंगे। दीपक चौधरी बनाम मेसर्स पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड मामले में सुनाए फैसले का उल्लेख करते हुए हरेरा अध्यक्ष ने बताया कि इस मामले में सुपरटेक लिमिटेड प्रमोटर था, जिसे सरकार ने लाइसेंस भी नहीं दिया था। सुपरटेक लिमिटेड ने पीएनबी फाइनेंस लिमिटेड से सुपरटेक ह्यूज नामक प्रोजेक्ट के लिए ऋण लिया, जिसमें सर्व रियलटर प्राइवेट लिमिटेड भी हिस्सेदार था। सुपरटेक लिमिटेड ऋण की वापसी करने में नाकाम रहा और डिफाल्टर हो गया। इसके बाद बैंक ने प्रोजेक्ट का अधिग्रहण करके ई-नीलामी के लिए डाल दिया। इस मामले में निवेशक दीपक चौधरी ने हरेरा से हस्तक्षेप की मांग की थी।
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नीलामी की अनुमति नहीं ली तो लगाया स्टे
खंडेलवाल ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए हरेरा गुरुग्राम ने ई-नीलामी प्रक्रिया पर स्टे लगा दिया, क्योंकि नीलामी के लिए प्राधिकरण से अनुमति नहीं ली गई थी। नीलामी के कारण परियोजना में शामिल 950 खरीदारों के हित भी प्रभावित होते, जिन्होंने परियोजना में 328 करोड़ से अधिक की राशि का निवेश किया है। उन्होंने कहा कि बैंक या वित्तीय संस्था की ओर से परियोजना की प्रगति का आकलन करने में जो कमी रही उसका खामियाजा खरीदार क्यों भुगते। हरेरा बैंक द्वारा अपने ऋण की वसूली के लिए परियोजना की नीलामी के विरोध में नहीं है, लेकिन बैंक को निवेशकों के हितों की रक्षा करते हुए नीलामी की प्रक्रिया को पूरा करना होगा। खंडेलवाल ने बताया कि कि हरेरा का पहला उद्देश्य यही है कि प्रोजेक्ट पूरा हो और उसके बाद ऋण देने वाली संस्था फ्लैट बेचकर अपने ऋण की वसूली करे। इससे खरीदारों के हितों की भी रक्षा होगी।
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खरीदार से नहीं होता वित्तीय संस्था का सीधा संबंध
खंडेलवाल ने बताया कि बिल्डर बायर एग्रीमेंट (बीबीए) खरीदार व प्रमोटर के बीच होता है। ऐसे में बिल्डर को ऋण देने वाले वित्तीय संस्थान का खरीदार से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इस मामले में वित्तीय संस्था ने इसलिए प्रोजेक्ट को टेकओवर किया क्योंकि उसको अपने ऋण की वसूली करनी थी, लेकिन हरेरा एक्ट में यह प्रावधान है कि प्रोजेक्ट की सभी देनदारियों तथा जिम्मेवारियों को ध्यान में रखते हुए ही वित्तीय संस्था प्रोजेक्ट की नीलामी कर सकती है। हरेरा द्वारा निर्धारित किया गया है कि गिरवी रखे प्रोजेक्ट का अधिग्रहण करने की स्थिति में वह प्रमोटर के स्थान पर आ जाएगा। बिल्डर बायर एग्रीमेंट होने के बाद कोई भी संपत्ति गिरवी नहीं रखी जा सकती। यदि गिरवी रखी भी गई है तो खरीदारों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
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