गीता भवन की रामलीला में मंच पर अभिनय करेंगी बेटियां
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। जिले में पारंपरिक रामलीलाओं के मंच पर जहां कभी स्त्री पात्रों की भूमिका भी पुरुष ही निभाते थे, वहां न्यू कॉलोनी गीता भवन की रामलीला ने एक बदलाव की शुरुआत की। वर्ष 1948 में पंजाब के फिरोजपुर से विस्थापित होकर आए परिवारों द्वारा शुरू की गई इस रामलीला ने, वर्ष 1992 में समाज के कड़े विरोध और बुजुर्गों की बंदिशों को दरकिनार करते हुए पहली बार महिलाओं को मंच पर उतारा।
चेयरमैन सुरेंद्र खुल्लर के प्रयास और ऋतु खुल्लर जैसी साहसी बेटियों की पहल से शुरू हुआ यह सफर आज महिला सशक्तिकरण की एक अद्भुत मिसाल बन चुका है। गीता भवन से शुरू हुई यह आधुनिक परंपरा अब मदनपुरी के बाल सुख सागर मंडल, भीम नगर और शहर की तमाम आधुनिक सोसाइटियों तक फैल चुकी है। आज इस मंच पर न केवल हिंदू बल्कि मुस्लिम परिवारों की बेटियां भी पूरी शिद्दत से माता सीता और अन्य महिला पात्रों को जीवंत कर सांप्रदायिक सौहार्द और नारी शक्ति का शंखनाद कर रही हैं।
डर को भगा देता है अभिनय का आनंद
रामलीला में काफी भीड़ होती है लेकिन कभी सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं हुई। मैं कुछ वर्षों से अभिनय कर रही हूं, लेकिन किसी चीज को लेकर कभी डर नहीं लगा है। - मानसी शर्मा, कैकई, सबरी और भागवंती की भूमिका, गीता भवन की रामलीला
हमारी रामलीला में बहुत सारी लड़कियां हैं, हर बार नई लड़कियां भूमिकाओं में होती हैं। अभ्यास में बहुत आनंद आता है। यहां की रामलीला शहर की अन्य रामलीलाओं से इस कारण भी अलग है। - सुहानी, सीता, वेदवती की भूमिका, गीता भवन की रामलीला
पिछले 15 वर्षों से रामलीला में कैकई और शबरी की भूमिका निभा रही हूं। रामलीला में अधिसंख्य कलाकार पुरुष हैं, बावजूद इसके दर्शक को महिलाओं के रोल में महिलाओं को देखना अच्छा लगता है। - लीना सेतिया, कैकई, शबरी की भूमिका, बालसुख सागर मंडल मदनपुरी
10 साल पहले रामलीला में अभिनय करना शुरू किया। तब से कौशल्या की भूमिका निभा रही हूं और अब यह मेरी पहचान ही बन गई है। अभ्यास और अभिनय करने दोनों में खूब आनंद आता है। - रिया वाधवा, कौशल्या की भूमिका बाल सुख सागर मंडल