राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की दमघोंटू हवा पर अजरबैजान के में जलवायु शिखर सम्मेलन कॉप-29 में भी गहरी चिंता जताई गई है। वहां विशेषज्ञों ने भारत को मीथेन और ब्लैक कार्बन जैसे जलवायु प्रदूषकों (एसएलसीपी) पर अधिक ध्यान देने का सुझाव दिया है। एसएलसीपी ग्रीनहाउस गैसों और वायु प्रदूषकों का समूह है, जो कम वक्त में जलवायु को बहुत गर्म करते हैं और वायु की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाते हैं। इस समूह में ब्लैक कार्बन, मीथेन, ग्राउंड-लेवल ओजोन और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) शामिल हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईजीएसडी) की कार्यक्रम निदेशक जेरिन ओशो और आईजीएसडी के अध्यक्ष दरवुड जेलके ने बताया कि एसएलसीपी में कमी लाने से प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से निपटा जा सकता है। दरवुड जेलके के मुताबिक, एसएलसीपी वर्तमान वार्मिंग के लगभग आधे के लिए जिम्मेदार हैं और इसे कम करने से हवा की गुणवत्ता सुधर सकती है। इससे तेजी से ठंडक भी आएगी, जो कि तब अहम हो जाता है जब वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा के करीब पहुंच रहा है। 2024 के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि तापमान जल्द ही इस सीमा को पार कर सकता है। भारत, खासकर दिल्ली गंभीर वायु प्रदूषण झेल रही है। इन प्रदूषकों पर ध्यान देकर सेहत और जलवायु दोनों के फायदे मिल सकते हैं। इसके साथ ही लंबे वक्त तक सीओ 2 उत्सर्जन को कम करने के लिए अहम वक्त भी मिल सकता है।
कॉप-29 एसएलसीपी सत्रों में गैरमौजूदगी खली
ओशो ने कहा कि भारत कॉप-29 में एसएलसीपी केंद्रित प्रमुख सत्रों में भारत की गैरमौजूदगी एक उल्लेखनीय कमी छोड़ दी। यह गैरमौजूदगी खास तौर पर इसलिए नजर आई,क्योंकि एसएलसीपी पर दुनिया भर में काफी ध्यान दिया जा रहा है। एक मजबूत भारतीय उपस्थिति गैर-सीओ-2 समझौतों के लिए समर्थन बढ़ाने में मदद कर सकती थी, जैसा कि राजनीतिक मतभेद के बावजूद एसएलसीपी पर अमेरिका-चीन के बीच सहयोग में देखा गया है। कॉप-29 की बातचीत का मुख्य बिन्दु जलवायु अनुकूलन के लिए वित्त पोषण पक्का करना रहा है। इसमें एसएलसीपी को कम करने के लिए 2 अरब अमेरिकी डॉलर पहले ही आवंटित किए जा चुके हैं। यदि भारत इसे सक्रिय तौर से प्राप्त करे तो उसे फायदा हो सकता है। उन्होंने सिफारिश की कि भारत जल्द ही शुरू होने वाले भारत कार्बन बाजार का फायदा उठाकर मीथेन के लिए एक अलग बाजार बनाने पर विचार करे, जिससे उसे 20 साल की अवधि में मीथेन की उच्च वैश्विक वार्मिंग क्षमता (जीडब्ल्यूपी) के आधार पर अधिक वित्तीय फायदा लेने में मदद मिलेगी।
भारत की कार्रवाई वैश्विक स्थिरता के लिए जरूरी : ओशो
आईजीएसडी की कार्यक्रम निदेशक ओशो के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और श्रमिक वर्ग पर अत्यधिक गर्मी का असर पड़ता है। इसमें एसएलसीपी का भी योगदान है। अत्यधिक गर्मी के कारण असंगठित क्षेत्र की लाखों नौकरियां प्रभावित होती हैं और अनियमित वर्षा की वजह से खाद्य उत्पादन में भी रुकावटें आती हैं। भारत चावल जैसे कई खाद्य पदार्थों का प्रमुख निर्यातक है, इसलिए ये समस्याएं वैश्विक खाद्य आपूर्ति को भी प्रभावित कर सकती हैं। खास तौर से उन क्षेत्रों में जो भारतीय निर्यात पर निर्भर हैं। इसलिए, एसएलसीपी उत्सर्जन को कम करने में भारत की कार्रवाई न केवल उसकी अपने लिए बल्कि बड़े पैमाने पर वैश्विक स्थिरता के लिए भी जरूरी है।
दिल्ली का प्रदूषण महज स्थानीय मुद्दा नहीं
ओशो ने कहा कि वायु गुणवत्ता के लिए दिल्ली का प्रदूषण महज स्थानीय मुद्दा नहीं है। हरियाणा के आसपास के क्षेत्र भी इसे प्रभावित करते हैं। ओशो इसके लिए एयरशेड अपनाने की सुझाव देती हैं। यह आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए मिली जुली कोशिशों पर केंद्रित है। उनका कहना है कि यह अलग-अलग राज्यों की नीतियों के मुकाबले अधिक असरदार हो सकता है। एयरशेड जमीन का वह क्षेत्र होता है, जिसके ऊपर से हवा में मौजूद प्रदूषक किसी खास जल निकाय में जा सकते हैं। यह प्रदूषकों के फैलाव को सीमित करते हैं। इसकी लागत में कमी लाने के लिए भारत सफल एलईडी बल्ब मॉडल की पहल कर सकता है। इस पहल ने सामूहिक खरीद के जरिये लागत में भारी कमी की। वह सुझाव देती हैं कि भारत इसी तरह के सामूहिक खरीद नजरिये के इस्तेमाल से एसएलसीपी घटाने वाली तकनीकों जैसे कि इलेक्ट्रिक बसों और स्वच्छ चूल्हों के लिए कर सकता है, ताकि ये अधिक किफायती हो सकें।
एसएलसीपी कम करने की प्रतिबद्धता सराहनीय
ओशो ने कहा, भारत इकलौता विकासशील देश है, जिसके पास समर्पित शीतलन कार्य योजना है। यह एसएलसीपी को कम करने की उसकी प्रतिबद्धता दिखाता है। एसएलसीपी और किगाली संशोधन से भारत पहले से ही हाइड्रोफ्लोरोकार्बन को कम करने में आगे है और उसने कूलिंग से जुड़े उत्सर्जन को कम करने के लिए इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान शुरू किया है। यह सक्रिय कोशिश भारत को जलवायु-अनुकूल तकनीक अपनाने वाले शीर्ष देशों में शामिल करता है। इन उपलब्धियों के बावजूद भारत को एसएलसीपी के क्षेत्र में अपनी कामयाबी के लिए वैश्विक स्तर पर ज्यादा मान्यता नहीं मिली है। इसका वजह यह है कि भारत की कॉप-29 जैसे कार्यक्रमों में मौजूदगी सीमित होती है। भारत को एसएलसीपी से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में सक्रिय तौर से भाग लेना चाहिए ताकि वह वित्त पोषण और समर्थन हासिल कर सके।
प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 18 को होगी
दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक के बढ़ते स्तर के बीच सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मामले पर 18 नवंबर को सुनवाई करने की सहमति दी है। न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष वायु प्रदूषण से संबंधित मामले का उल्लेख किया। सिंह ने पीठ से आग्रह किया कि दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण की पृष्ठभूमि में मामले की तत्काल सुनवाई की जाए। सिंह ने पीठ के समक्ष कहा कि बुधवार से हम गंभीर स्थिति में हैं। इस स्थिति से बचने के लिए ही इस अदालत ने संबंधित सरकार और अथॉरिटी एहतियाती कदम उठाने के लिए कहा है लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि हमें दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर नहीं बनना चाहिए। इसपर पीठ ने मामले की सुनवाई 18 नवंबर के लिए निर्धारित कर दी।