इराक के रहने वाले हुसैन के तीन वर्षीय बेटे अब्दुल को जन्म से ही डिस्प्लास्टिक (किडनी की बीमारी) बीमारी थी।
किसी तरह अब्दुल की किडनी दो वर्षों तक काम करती रही लेकिन जब स्थिति बेहद खराब हो गई तब उसे इलाज के लिए भारत लाया गया और फिर फरीदाबाद के एक निजी अस्पताल में बच्चे का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया।
बच्चे के नाना ने किडनी दान की है। अब्दुल अब पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई है।
अस्पताल पहुंचने पर पूरी तरह सूख चुकी थी किडनी
दिल्ली प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ.एन.के.पांडेय ने बताया कि करीब छह माह से बच्चे को इराक में हीमोडायलिसिस दी जा रही थी।
जबकि इस उम्र में सीएपीडी पेरीटोनियल डायलिसिस देनी चाहिए। लेकिन इराक में यह सुविधा उपलब्ध नहीं होने की वजह से बच्चे की किडनी और लगातार खराब होती चली गई।
अस्पताल की मुख्य ट्रासप्लांट सर्जन डॉ. विजय लक्ष्मी ने बताया कि जब बच्चे को अस्पताल लाया गया था तब उसकी किडनी पूरी तरह से सूख गई थी।
बड़ी थी नाना की किडनी तो अब्दुल को आई परेशानी
जांच में पता चला कि अब्दुल के पेशाब में प्रोटीन और यूरिया क्रेटीन का स्तर काफी बढ़ गया था, जिसकी वजह से उसकी किडनी फेल हो गई थी।
उन्होंने बताया कि बच्चे को उसके नाना (48 वर्षीय) की किडनी लगाई गई, जो बच्चे की उम्र के हिसाब से बड़ी थी। किडनी का आकार बड़ा होने की वजह से सर्जरी के बाद भी बच्चे को काफी दिक्कत आई।
डॉ. जितेंद्र कुमार ने बताया कि सर्जरी के बाद बच्चे के हृदय पर दबाव बढ़ने लगा, जिसकी वजह से अब्दुल को स्टेस्नोपैथी हो गया। इस वजह से बच्चे को एक सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। इस इलाज के दौरान परिजन को करीब साढ़े छह लाख रुपये खर्च करने पड़े।