चंद्रमोहन शर्मा
गाजिाबाद। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले पांच फीसदी कम मतदान हुआ है। अब लाख टके का सवाल यही है कि मतदान घटने से किसका नफा हुआ और किसका नुकसान ? सही जवाब तो चार जून को ही मिलेगा। लेकिन, इतना जरूर है कि इस बार मुकाबला कांटे का रहा। कांग्रेस की डाॅली शर्मा ने अभेद माने जाने वाले भाजपा के किले की तगड़ी घेराबंदी की। अगर भाजपा अपनी जीत पक्की मानकर बेफिक्री से चुनाव लड़ती तो कहानी बदल सकती थी। लेकिन, राजनीति अगर मगर का खेल नहीं। यहां एक गलती हो जाए तो सुधार करने के लिए पांच साल इंतजार करना पड़ता है।
इस बार भाजपा ने क्षत्रिय को टिकट देने की परंपरा तोड़ी। पहली बार वैश्य कार्ड चला। चौंकाने वाले फैसले में चुनाव फंस जाने का डर था। लग रहा था कि नतीजों का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। लिहाजा बहुत पापड़ बेलने पड़े। आक्रामक प्रचार को हथियार बनाया। सीएम योगी से लेकर पीएम मोदी तक स्टार प्रचारकों की पूरी फौज उतारी। वक्त का तकाजा देख आरएसएस के स्वयंसेवकों ने भी पसीना बहाया। अगर एड़ी-चोटी का इतना जोर न लगाया गया होता तो राह और मुश्किल हो सकती थी।
20 साल से जीत के लिए तरस रही कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का पुराना अनुभव लेकर उतरीं डाॅली शर्मा ने सोशल मीडिया पर हल्ला मचाने से लेकर सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले आजमाने तक में कोई कसर नहीं छोड़ी। अस्पताल, काॅलेज, गंगाजल, महिला सुरक्षा और ट्रैफिक जाम जैसे स्थानीय मुद्दों पर जनता के दिल में उतरने का प्रयास किया।
इन मुद्दों को भाजपा की राह के कांटे बनाने की चाल भी चली। अगर कांग्रेस का संगठन भाजपा की तरह मजबूत होता और बड़े नेता रैली-रोड शो करने के लिए आते तो चुनाव की कहानी कुछ और हो सकती थी। जिस जिले में नगर निगम से लेकर जिला पंचायत तक भगवा परचम लहरा रहा हो और सभी पांच सीट पर विधायक भी भाजपा के हों, वहां लड़ाई एक नहीं, कई मोर्चों पर एक साथ लड़नी होती है। इतना जरूर है कि पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार डाॅली को समर्थन ज्यादा मिलता नजर आया। यह समर्थन वोट में कितना बदला, इसका खुलासा चार जून को होगा।
पहली बार दलित-ठाकुर
समीकरण पर चला हाथी
बसपा ने पहले पंजाबी समाज के अंशय कालरा पर भरोसा जताया, फिर वीके सिंह को मैदान में न उतरता देख चाल बदल दी और क्षत्रिय समाज के नंद किशोर पुंडीर को टिकट दे दिया। पुंडीर एक ऐसी गलती कर बैठे जिसका जवाब देते न बना। उनकी पत्नी और भतीजे ने भी नामांकन कर दिया। समय रहते दोनों ने पर्चा वापस भी नहीं लिया। उनकी रणनीति दलित और ठाकुर समीकरण बनाने की रही लेकिन इसमें पूरी तरह सफलता मिलती नहीं दिखी। न दलित एकजुट हुए और ठाकुर एकतरफा चले। यह पहला मौका था जब बसपा ने दलित-ठाकुर समीकरण बनाया। इससे पहले यहां पार्टी के उम्मीदवार मुस्लिम और ब्राह्मण समाज से रहे।