जैविक खाद, फास्फोरस और पोटाश के कम उपयोग के कारण वेस्ट यूपी की मिट्टी खराब हो रही है। भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में मिट्टी के नमूनों की जांच के बाद यह सच सामने आया है।
भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में पिछले साल मिट्टी के 5500 और इस साल अब तक 2035 नमूनों की जांच की गई। जांच में जीवांश कार्बन न्यूनतम आया है, यह मध्यम होना चाहिए। जीवांश कार्बन का मतलब है मिट्टी में जीवों का जिंदा रहना।
ये जीव मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी को पूरा करते हैं। नाइट्रोजन की कमी से मिट्टी चिपक जाती है इससे पानी पौधों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाता। जांच में फासफोरस की मात्रा अति न्यून आई है इससे पौधों में ग्रोथ नहीं हो पाता।
वहीं यहां पहले पोटाश उच्च मात्रा में उपलब्ध था, अब जांच में इसका रिजल्ट मध्यम आया है। मालूम हो कि नाइट्रोजन, फासफोरस और पोटाश तीनों पौधों के मुख्य पोषक तत्व हैं। इनकी कमी से उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है।
भूमि परीक्षण प्रयोगशाला के अध्यक्ष एसपी सिंह ने बताया कि नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए किसान खेतों में यूरिया डालते हैं लेकिन वे फासफोरस व पोटाश का प्रयोग नहीं करते।
मिट्टी में यूरिया, फासफोरस व पोटाश डालने का रेशियो 4:2:1 होना चाहिए। इस रेशियो को प्रयोग में नहीं लाने से मिट्टी खराब होती है। सिर्फ यूरिया डाल देने से पौधों में हरियाली तो आ जाती है लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता अपेक्षित नहीं रह जाती है।
जैविक खाद का उपयोग कम करते हैं किसान
गाजियाबाद में कई जगहों पर जैविक खाद तैयार होने लगा है। खासकर गोबर व केंचुए से बनने वाला यह खाद जीवांश कार्बन पैदा करने में काफी उपयोगी होता है। इससे उत्पादन बढ़ता है और फसलों की शुद्धता की गारंटी होती है।
लेकिन किसान इसका कम उपयोग करते हैं। इसके पीछे वजह यह है कि किसानों ने रसायनिक खाद व दवाइयों का प्रयोग कर मिट्टी की नेचुरलिटी को खत्म कर दिया है। ऐसी मिट्टी पर जैविक खाद अपना असर दो-तीन साल बाद ही डाल पाता है। ऐसे में खासकर छोटे किसान दो-तीन साल तक फसलों के नुकसान होने का रिस्क नहीं उठाना चाहते हैं।
बांटे जा रहे हैं मिट्टी के स्वास्थ्य कार्ड
मोदी सरकार ने पिछले दो साल से मृदा (मिट्टी) स्वास्थ्य कार्ड अभियान चलाया है। इसका उद्धेश्य रसायनिक उर्वरकों के प्रयोग में कम से कम 20 फीसदी कमी लाना और जैविक खादों के प्रयोग में वृद्धि के साथ फसलों की गुणवत्ता व उत्पादन बढाना है।
जिले में कुल 171 गांव हैं जिनमें से 60 गांवों में ये कार्ड बांटे गए हैं बाकी गांवों में कार्ड बांटने का काम जारी है। इस कार्ड में मिट्टी की 12 जांचें और रसायनिक व जैविक खाद के उपयोग की मात्रा दर्ज की जाती है।
जिला कृषि अधिकारी एमपी सिंह ने बताया कि किसानों को कार्ड मिलने की तिथि के तीन साल बाद यह समीक्षा की जाएगी कि उन्होंने कार्ड में सुझाए गए उपायों पर कितना अमल किया। तीन साल बाद फिर उनके खेत की मिट्टी की जांच होगी और उन्हें नए कार्ड दिए जाएंगे। उन्होंने दावा किया कि किसानों की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में ये कार्ड काफी कारगर साबित होंगे।
घट रही है खेतिहर जमीन
गाजियाबाद में हो रहे विकास के चलते खेती की जमीन घट रही है। 2013 में कुल जमीन 53,129 हेक्टेयर थी। वर्तमान में 52,641 हेक्टेयर है। किसानों की कुल संख्या 49,139 है।