गाजियाबाद। कानूनी जटिलताओं और महीनों की सुनवाई के बाद आठ वर्षीय बच्चा आखिरकार अपनी विधवा मां की गोद में लौट आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए बच्चे की अभिरक्षा उसकी मां मीनाक्षी को सौंप दी। अदालत ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक और सर्वांगीण विकास के लिए मां के साथ रहना अधिक उचित होगा। अदालत के फैसले के बाद दादी की आंखों में पोते के विछोह का गम भी दिखाई दिया।
मीनाक्षी के अधिवक्ता ने याचिका में बताया कि पति की मृत्यु के बाद उनका बेटा ससुराल पक्ष के पास रखा गया और उसे वापस नहीं किया गया। वहीं, दादा-दादी का कहना था कि वे आर्थिक और पारिवारिक रूप से बच्चे की बेहतर देखभाल कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, पारिवारिक माहौल और बच्चे के हितों पर ध्यान दिया। अदालत ने पाया कि मां शिक्षित हैं, ट्यूशन पढ़ाकर आय अर्जित करती हैं। पहले से ही वह अपनी छोटी बेटी की देखभाल कर रही हैं। इसके अलावा मां बच्चे की पढ़ाई, रोजमर्रा की देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के कल्याण का मूल्यांकन केवल आर्थिक साधनों से नहीं किया जा सकता। स्नेह, देखभाल और भावनात्मक लगाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी आधार पर अदालत ने दादा-दादी को आदेश दिया कि वे बच्चे की अभिरक्षा तुरंत मां को सौंप दें। सोमवार को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष हाईकोर्ट का आदेश लागू हुआ। दादी ने संकोच भरे भाव के साथ बच्चे को मां के हवाले किया। कुछ ही क्षणों में मां और बेटे की आंखों में खुशी और राहत के आंसू छलक उठे। वहीं दादी की आंखों में पोते के विछोह का गम भी दिखाई दिया। अधिवक्ता अनुज जैन और स्वाति चहल ने मां की ओर से पैरवी की। इस मार्मिक पल ने साबित कर दिया कि न्याय का अंतिम उद्देश्य हर बच्चे के लिए सुरक्षित, प्रेमपूर्ण और पोषणयुक्त वातावरण सुनिश्चित करना है। दादा-दादी की गोद से मां की बाहों तक लौटते बच्चे का यह सफर भावनाओं और न्याय का प्रतीक बन गया।