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बेगमाबाद की शाही मस्जिद यहां सबसे पहले पढ़ी थी बेगम समरू ने नमाज

Wed, 15 Jun 2016 01:22 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, गाजियाबाद
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मस्जिद के सामने जुमे की नमाज अदा करते मुस्लिम बंधु। - फोटो : अमर उजाला
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रमजान के पाक महीने में आज आपको रूबरू कराया जा रहा है मोदीनगर के बेगमाबाद गांव की शाही जामा मस्जिद से। यहां सैकड़ों सालों से अकीदतमंद अल्लाह की बारगाह में सर झुकाते आ रहे हैं। मस्जिद करीब सवा दो सौ साल पुरानी है।
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बुजुर्ग बताते हैं कि मुगल शासन काल में मस्जिद के स्थान पर बेगम समरू ने नमाज पढ़ी थी, तभी से इस स्थान पर नमाज शुरू हो गई थी। यह करीब डेढ़ बीघा में बनी है, इस मस्जिद में तीन हजार से ज्यादा लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। ईद की नमाज के दौरान तो तादाद पांच हजार के पार पहुंच जाती है।

बदलते परिवेश में सौंदर्यीकरण के चलते अब मस्जिद का नक्शा बदल गया है। पहले यह इतनी बड़ी नहीं थी। उस वक्त मस्जिद के आसपास की आबादी भी सौ-दो सौ ही थी। शाही मस्जिद कमेटी के पूर्व मुतवल्ली डा. शाहिद अहमद ने बताया कि मुगल शासन काल में मस्जिद से सटा रास्ता लाहौरी मार्ग कहलाता था। सेना के आने-जाने के लिए यह पैदल मार्ग था।
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अक्सर सेना मोदीनगर के बेगमाबाद और मेरठ के सरधना में डेेरा डालती थी। करीब सवा दो सौ साल पहले सेना के साथ बेगम समरू ने बेगमाबाद में पड़ाव डाला था। कई वर्ष पड़ाव रहा था। इस दौरान बेगम ने शाही जामा मस्जिद के स्थान पर नमाज पढ़ी थी और तभी मस्जिद के निर्माण का हुकुम सुनाया था। मस्जिद के इमाम सिराज अहमद बताते हैं कि मस्जिद में स्थित वटवृक्ष 450 वर्ष पुराना बताया जाता है। वक्फ बोर्ड के अधीन मस्जिद में 1966 से मदरसा चल रहा है।

1971 में बेसिक शिक्षा परिषद से मदरसे को मान्यता मिली थी और 2009 में इस मदरसे को जूनियर हाईस्कूल की मान्यता मिली।

कौन थी बेगम समरू
बेगम समरू उर्फ फरजाना का जन्म 1753 में दिल्ली में हुआ था। फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के भाड़े के लड़ाकू कमांडर रेनहार्ट से उन्होंने शादी की थी। मुगल शासन काल में बेगम समरू की जंग ए मैदान से लेकर सियासत के अखाड़े तक तूती बोलती थी। वह 1837 में अपनी मौत होने तक सरधना, मेरठ की जागीर पर काबिज रही थीं। दूसरी तरफ, इतिहास में दर्ज है कि बेगमाबाद गांव की स्थापना नवाब जाफर अली ने की थी। उनकी बेगम की मौत के बाद इसका नाम बेगमाबाद पड़ा था।
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