नगर निगम की कार्यप्रणाली फिर विवादों में आ गई है। एक एडवोकेट को केस फीस की बजाय 15 हजार रुपये महीना वेतन पर आरटीआई सुनवाई के लिए कांट्रेक्ट पर तैनात करने के आरोपों के बाद अब शासन ने इस पर जांच बैठा दी है।
स्थानीय निकाय निदेशक ने नगर आयुक्त से इस मामले पर एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। राज्य सूचना आयोग में आरटीआई अपील के मामलों में निगम का पक्ष रखने के लिए 2011-12 में रिटेनरशिप पर एडवोकेट शैलेंद्र सिंह चौहान की तैनाती की गई थी।
शैलेंद्र सिंह का आरोप था कि नगरायुक्त अब्दुल समद ने गुपचुप दूसरे अधिवक्ता को यह जिम्मेदारी दे दी और उनको बिना कार्य के हर महीने 15 हजार रुपये भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने नगर विकास सचिव को शिकायत भेजकर नगरायुक्त पर मनमानी का आरोप लगाया था।
उनका कहना है कि निगम पर उनका करीब चार लाख रुपया बकाया है। शैलेंद्र सिंह ने शिकायत में कहा था कि निगम की ओर से राज्य सूचना आयोग में ढंग से पैरवी नहीं हो रही, कई अधिकारियों पर जुर्माना लग चुका है।
बावजूद इसके नगरायुक्त के करीबी होने की वजह से नए अधिवक्ता को पैसा दिया जा रहा है। अब इस मामले में स्थानीय निकाय निदेशक ने नगरायुक्त से रिपोर्ट मांगी है। माना जा रहा है कि इस मामले में निगम अफसरों पर कार्रवाई हो सकती है।