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Ghaziabad News: चीखती रही बेटी...सोता रहा सिस्टम

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गाजियाबाद। सात घंटे, एक कार और मदद की आस में गुजरता हर पल। 27 जुलाई की रात दरिंदगी की शिकार हुई 10वीं की छात्रा को उम्मीद थी कि कहीं न कहीं पुलिस दिखेगी, कोई उसकी चीख सुन लेगा और कार रुकवा देगा। कार दो बार थाने के सामने से गुजरी भी, रास्ते में पुलिस चौकियां मिलीं और पुलिसकर्मी भी दिखे, लेकिन किसी ने उसकी बेबस चीखें नहीं सुनीं।
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चौंकाने वाली बात यह है कि दिन में चार पहिया वाहनों के शीशों से काली फिल्म उतरवाने वाली पुलिस रात में आरोपियों की कार के शीशे पर सन शेड लगा होने के बाद भी नहीं चेती। इतना ही नहीं, पीड़िता के पुलिस की चौखट पर पहुंचने के बाद एफआईआर दर्ज होने में भी चार दिन लग गए। इस पूरी घटना ने कानून व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रात में कार के शीशे पर सन शेड लगा होने के बाद भी पुलिस का नहीं चेतना और चौंकाने वाला है।
उस बोझिल रात को दुष्कर्म की शिकार हुई किशोरी जितनी बेबस थी, अपराधी उतने ही बेखौफ और व्यवस्था सुस्त। पीड़िता के मुताबिक, आरोपी पहली बार रात करीब आठ बजे और दूसरी बार करीब दो बजे उसे कार में लेकर मसूरी थाने के सामने से गुजरे। रास्ते में दो स्थानों पर पुलिस का वाहन खड़ा मिला। पिलखुवा की ओर जाते समय सड़क किनारे चीता बाइक पर पुलिसकर्मी भी दिखाई दिए। इस दौरान वह लगातार रोती-गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उसकी आवाज किसी तक नहीं पहुंच सकी।
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रास्ते में आरोपियों ने एक मेडिकल स्टोर पर कार रोकी और कुछ दवाएं खरीदीं। इस दौरान किशोरी ने कार से निकलने की कोशिश की, लेकिन आरोपियों ने उसे काबू कर लिया। इसके बाद वे उसे एक सुनसान रास्ते पर बने फार्म हाउस में ले गए। वहां तैनात गार्ड ने गेट खोला। कुछ देर अंदर रहने के बाद आरोपी फिर उसे लेकर निकल गए। पीड़िता का कहना है कि अगर कहीं भी किसी ने सतर्कता दिखाई होती तो शायद उसकी पीड़ा इतनी लंबी न होती।

फार्म हाउस का राज भी जांच के घेरे में
पीड़ित मां का कहना है कि पुलिस को फार्म हाउस के गार्ड और मालिक से भी पूछताछ करनी चाहिए। उनका कहना है कि गार्ड ने गेट खोला था, इसलिए उसकी भूमिका की भी जांच जरूरी है। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि आरोपी वहां किस मकसद से गए थे। हालांकि, सदमे में होने के कारण किशोरी फार्म हाउस की सही लोकेशन नहीं बता पा रही है।

चार दिन तक एफआईआर नहीं, मेडिकल में भी देरी
पीड़िता की मां का आरोप है कि उन्होंने 28 जुलाई की दोपहर मसूरी थाने में शिकायत दी थी। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय कई सवाल पूछकर उन्हें टाल दिया। उनका कहना है कि एक अगस्त को यानी चार दिन बाद तब एफआईआर दर्ज की गई, जब उन्होंने पुलिस आयुक्त से शिकायत करने की बात कही। आरोप है कि पीड़िता का मेडिकल भी समय पर नहीं कराया गया और आरोपियों की पहचान बताने के बावजूद गिरफ्तारी में देरी हुई।
हालांकि, एसीपी सुनील कुमार सिंह का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी थी। शुरुआती जांच में कुछ विरोधाभासी तथ्य सामने आए थे, इसलिए सत्यापन के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।
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उठ रहे सवाल
-रात में कार के शीशे पर सन शेड लगा देखकर भी पुलिस को अंदेशा क्यों नहीं हुआ।
-जब कार दो बार थाने के सामने से गुजरी तो वह पुलिस की नजर से कैसे बची?
-हाईवे और सर्विस रोड पर गश्त के दावों के बावजूद किसी ने कार को क्यों नहीं रोका?
-मेडिकल स्टोर और फार्म हाउस तक पहुंचने के दौरान किसी को शक क्यों नहीं हुआ?
-शिकायत मिलने के बाद एफआईआर दर्ज करने और मेडिकल कराने में चार दिन की देरी क्यों हुई?
-फार्म हाउस और वहां मौजूद गार्ड की भूमिका की अब तक गहराई से जांच क्यों नहीं हुई?

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