चुनाव प्रचार के नित्य नए प्रयोगों के बीच हम आपको बताने जा रहे हैं गाजियाबाद के पहले चुनाव की कहानी। जी हां, 1952 के विधानसभा चुनाव में महज 150 रुपये खर्च कर तेजा सिंह पहले चुनाव में विधायक बने थे। उनका ये चुनावी खर्च भी अपनी जेब से नहीं हुआ था। इलाके के लोगों ने चंदा करके सहयोग दिया था।
अब बात करें प्रचार की तो आज 28 लाख का खर्च भी कम पड़ रहा है, उस पर जीत की गारंटी भी नहीं, लेकिन तब तो साइकिल से धौलाना और लोनी तक के प्रचार ने ही जीत के प्रति आश्वस्त कर दिया था।तेजा सिंह को बापू जी कहते थे। जनता की समस्याएं जहां होती थीं, बापू जी वहां मौजूद होते थे।
लगातार 15 साल तक इलाके की सेवा करने के दौरान तेजा सिंह का कद कभी जनता से बड़ा नहीं हुआ। बापू देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान के सरगोधा से आकर गाजियाबाद में बसे थे। तेजा सिंह के बड़े बेटे सरदार नरेंद्र सिंह के दामाद गुरुदेव सिंह मल्होत्रा ने बताया कि स्कूल हैडमास्टर से रिटायर होने के बाद तेजा सिंह ने राजनीति शुरू की थी।
साइकिल पर वह कैला भट्ठा से लेकर धौलाना, मोदीनगर, लोनी तक के गांवों के चक्कर लगाते थे। हर गांव में लोगों से हालचाल पूछते और समस्या होने पर उसका निदान भी करते। अगर अभी के चुनाव को देखें तो चुनाव इसके उलट हो गया है। प्रत्याशी करोड़ों खर्च करते हैं। शराब और रुपये बांटे जाते हैं। हेलीकॉप्टर से प्रचार होता है।
इसके बाद भी जीतने की उम्मीद न के बराबर होती है। फेसबुक से लेकर ट्वीटर तक पर चुनाव ट्रेंड करता है। नित्य नए प्रयोग नए हथकंडे लेकिन नतीजा आज जनता की चुप्पी ऐन वक्त तक टूटने को तैयार नहीं दिखती।वैशाली सेक्टर पांच निवासी महितोष 70 साल के मुताबिक , समय के साथ चुनाव लड़ने का तरीका भी बदल गया है।
पहले प्रत्याशी किसे बनाना है, वह आम जनता चुनती थी। अब प्रत्याशी लाखों रुपये देकर टिकट मांगते हैं। राजनीतिक दलों का भी मकसद अब जनसेवा नहीं बल्कि घोटाला करके करोड़ों-अरबों रुपये कमाना हो गया है।
जबकि पहले ऐसा नहीं था, 1952 में पहले चुनाव में क्षेत्रवासियों के आग्रह पर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से टिकट देने को कहा था। चुनाव लड़ने के लिए जनता से मिले करीब 150 रुपये ही थे। इतनी धनराशि खर्च करने के बाद तेजा सिंह गाजियाबाद के पहले विधायक बन गए।
वह 1952 से लगातार 15 वर्ष तक चुनाव जीते, लेकिन कभी भी गाड़ी में नहीं बैठे। वह रोजाना साइकिल लेकर निकल जाते। लोगों की समस्याएं सुनते और मौके पर ही उसका निदान करते।