नोट : साप्ताहिक की खबर आठ अक्तूबर : विश्व दृष्टि दिवस
आठ से 14 साल की उम्र में बढ़ी चश्मे की जरूरत
विश्व दृष्टि दिवस पर सामने आई चिंताजनक तस्वीर
-इस वर्ष 19 हजार बच्चों की आंखों की हुई जांच, 899 में निकली कमजोरी
माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। मोबाइल फोन की स्क्रीन अब बच्चों की पढ़ाई और मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। देर रात तक मोबाइल फोन चलाने और दिन में कई घंटे टैबलेट, लैपटॉप या कंप्यूटर पर समय बिताने का असर बच्चों की आंखों पर साफ दिखाई देने लगा है। जिले के सरकारी अस्पतालों में आंखों की परेशानी लेकर पहुंचने वाले आठ से 14 वर्ष के बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इस वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच इस आयु वर्ग के 19 हजार से अधिक बच्चों की आंखों की जांच की गई। इनमें 899 बच्चों की नजर कमजोर मिली। कई बच्चों को चश्मा लगाने की जरूरत पड़ी, जबकि कुछ को आगे इलाज की सलाह दी गई।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच इसी आयु वर्ग के महज 1640 बच्चों की आंखों की जांच हुई थी। इस लिहाज से इस वर्ष जांच कराने वाले बच्चों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। चिकित्सकों का कहना है कि कोरोना काल के बाद ऑनलाइन पढ़ाई के साथ मोबाइल फोन और डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल बच्चों की दिनचर्या में तेजी से बढ़ा है। अब इसका असर आंखों में परेशानी के रूप में सामने आ रहा है।
संयुक्त अस्पताल संजय नगर की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुचिता के अनुसार बच्चों में आंखों के सूखने की समस्या पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने के दौरान बच्चे कम पलक झपकाते हैं। इससे आंखों की नमी प्रभावित होती है। ऐसे में बच्चों की स्क्रीन देखने की आदत पर अभिभावकों को नजर रखने की जरूरत है।
शोध में भी सामने आया स्क्रीन का असर
संयुक्त अस्पताल के पूर्व नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र सिंह का कहना है कि बच्चों में डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल और आंखों की समस्या को लेकर हुए अध्ययनों में भी चिंता जताई गई है। कोविड काल के दौरान डिजिटल आई स्ट्रेन (आंखों में जलन या थकान) अध्ययन में बच्चों के बीच डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल के साथ आंखों में तनाव की समस्या का आकलन किया गया। अध्ययन में औसतन स्क्रीन इस्तेमाल का समय कोरोना काल में बढ़कर करीब चार घंटे प्रतिदिन हो गया था और डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या लगभग आधे बच्चों में पाई गई। पांच घंटे से अधिक स्क्रीन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में जोखिम भी अधिक पाया गया।
मोतियाबिंद के ऑपरेशन भी बढ़े
आंखों की परेशानी सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल जनवरी से अगस्त के बीच जिले में 52 हजार से अधिक लोगों में मोतियाबिंद की समस्या सामने आई। इनमें 10,832 मरीजों की सर्जरी की गई। पिछले साल इसी अवधि में 9784 मोतियाबिंद ऑपरेशन हुए थे। इस तरह ऑपरेशन की संख्या में करीब 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
एमएमजी अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र कुमार के अनुसार बच्चों का स्क्रीन टाइम नियंत्रित करना जरूरी है। छोटे बच्चों को केवल जरूरत के समय ही मोबाइल फोन या अन्य डिजिटल उपकरण देने चाहिए। लगातार स्क्रीन देखने की बजाय बीच-बीच में आंखों को आराम देना जरूरी है।
ऐसे रखें बच्चों की आंखों का ख्याल
बच्चों को लगातार लंबे समय तक मोबाइल या अन्य स्क्रीन देखने से रोकें। सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम से कम रखें। बच्चों को रोजाना बाहर खेलने और प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें। पढ़ाई, खेल, नींद और परिवार के साथ बातचीत का समय स्क्रीन के कारण प्रभावित न होने दें। अगर बच्चा बार-बार आंखें मिचमिचाता है, सिरदर्द की शिकायत करता है, आंखों में दर्द या सूखापन रहता है अथवा दूर की चीजें देखने में परेशानी महसूस करता है तो उसकी आंखों की जांच नेत्र विशेषज्ञ से करानी चाहिए।