प्रदूषण का स्तर से बढ़ने से त्वचा रोग से संबंधित मरीजों की भी परेशानी बढ़ गई है। जिला अस्पताल में रोजाना 150 से 200 मरीज त्वचा रोग से संबंधित इलाज कराने पहुंचे रहे हैं। त्वचा रोग विशेषज्ञों का कहना है कि पहले पांच से सात दिन में बीमारी ठीक हो जाती थी लेकिन अब मरीजों को 15 दिन तक दवाई लेनी पड़ रही है। इसका बड़ा कारण प्रदूषण के संपर्क में त्वचा का आना है।
एमएमजी अस्पताल के वरिष्ठ त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. एके दीक्षित का कहना है कि इस मौसम में दाद, एग्जिमा, मुंहासे, त्वचा के रोमकूपों के बंद होने से फुंसी, बैक्टीरिया, एलोपेसिया एरीटा (बालों का छोटे-छोटे पैच में झड़ना) एटोपिक डर्माटाइटिस (एक्जिमा), सोरायसिस, रेनॉड (हाथ और पैर उंगलियों या शरीर के दूसरे हिस्सों में रक्त प्रवाह कम होना), रोसैसिया (चेहरे पर लाल, मोटी त्वचा और मुंहासे), विटिलिगो (त्वचा पर धब्बे बनने से रंग खोना), कोल्ड सोर (होंठ के किनारे पर घाव) के मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं।