गाजियाबाद। मॉक ड्रिल और ऑपरेशन सिंदूर होते ही लोगों को फिर से 1971 का ब्लैकआउट और युद्ध की याद आई। उस दौरान युद्ध में शामिल योद्धाओं और सामान्य लोगों ने अपनी पुरानी यादों को साझा किया।
लगे हाथ निपटा ही देते पिंडी और लाहौर को...
1969 में सेना में लेफ्टिनेंट बनने के बाद कर्नल तेजेंद्रपाल त्यागी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। उन्होंने युद्ध के दौरान अत्यंत जोखिम भरी स्थिति में पांच घायल सैनिकों को दुश्मन के क्षेत्र से सुरक्षित बाहर लाने का कार्य किया, जिसके लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इस बहादुरी के कारनामे ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक अद्वितीय पहचान मिली। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान जब सीज फायर की घोषणा हुई तो हमारे दिल से आवाज आई कि... कुछ दिन और जो चलने देते इस बलिदानी दौर को लगे हाथ निपटा ही देते पिंडी और लाहौर को...। उन्होंने कहा कि सरकार के ऑपरेशन सिंदूर की सराहना करते हैं। लेकिन 1971 की तरह बिना फैसले के यह अभियान नहीं रुकना चाहिए। उस युद्ध में अगर सीज फायर नहीं होता तो ना ही देश में 26/11 होता ना ही पहलगाम जैसी घटनाएं होतीं। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान मेरे परिवार वालों ने खासकर ससुर जी ने काफी मनोबल बढ़ाया था।
रक्तदान के लिए कतार लगाकर लोग रहते थे खड़े
राजनगर एक्सटेंशन निवासी एमके अग्रवाल ने बताया कि 1971 में वह महज 10 वर्ष के थे लेकिन उन्हें अच्छी तरह से उस समय के युद्ध की स्थिति याद है। ब्लैकआउट के दौरान पूरी तरह से अंधेरा करके रहना होता था। दरवाजे खिड़कियों को बिल्कुल ढक कर रखते थे। दुकानों के ऊपर और छतों को भी लोग पेड़-पौधे और पत्तियों से ढक देते थे। उन्होंने बताया कि उस समय रक्तदान करने के लिए भी काफी होड़ थी। पिता-चाचा ताऊ सहित बड़े भैया सभी रक्तदान करने के लिए कतार में लगे रहते थे। घरों में लोग अतिरिक्त राशन एकत्र करके रखते थे। बताया गया था कि जैसे ही सायरन बजे वैसे ही अंधेरा कर देना है।