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नेता जी! सेहत और चिकित्सा को भी मुद्दा बनाइए

Sat, 04 Feb 2017 12:08 AM IST
ब्यूरो , अमर उजाला गाजियाबाद
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सेहत और चिकित्सा - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली एनसीआर में होने के बावजूद गाजियाबाद की चिकित्सा सेवाएं अपने उद्धार की बाट जोह रही हैं।  दिल्ली और गुड़गांव मेडिकल टूरिज्म में नाम कमा रहे हैं, तो राज्य सरकार की अनदेखी के चलते गाजियाबाद मेडिकल टूरिज्म में अभी अपना अस्तित्व तलाश रहा है।

जनप्रतिनिधियों ने कभी स्थानीय स्तर पर कभी सेहत और चिकित्सा को मुद्दा नहीं बनाया है। जहां दक्षिण भारत की राज्य सरकारों ने सार्थक प्रयासों से अपने जिलों को मेडिकल टूरिज्म क्षेत्र में ख्याति दिलाई वहीं उत्तर प्रदेश में ऐसे कदम राज्य सरकार ने नहीं उठाए।
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प्राइमरी और एडवांस चिकित्सा के लिए अस्पतालों में अंतर ही नहीं है, नतीजा मामूली सर्जरी के लिए भी मरीज एम्स या पीजीआई में भर्ती किया जा रहा है, जबकि इन अस्पतालों में एडवांस लेवल का ही इलाज होना चाहिए। विधानसभा चुनाव-2017 के मद्देनजर अमर उजाला कार्यालय में शहर के डॉक्टरों के साथ ही टेबल टॉक की, जहां उन्होंने अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि ऐसा जनप्रतिनिधि होना चाहिए, जो चिकित्सा को भी तवज्जो दे। इसके साथ ही डॉक्टरों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।

समस्याएं
- चिकित्सकों की सुरक्षा की ओर सरकार का ध्यान नहीं
- क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट से डॉक्टरों का शोषण हो रहा है

- चिकित्सा सुविधा के लिए बजट कम है
- विदेशी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जा रहा है

- इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, प्राइवेट मेडिकल को बढ़ावा नहीं मिलना
- सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधा नहीं

- एक रजिस्टर्ड डॉक्टर पर 20 झोलाछापों की मौजूदगी

सुक्षाव
- मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया जाए
- पांच साल में एक बार क्लीनिक रजिस्ट्रेशन या नवीनीकरण हो

- विदेशी अस्पतालों के बजाए शहर के अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाए
- बिजली, परिवहन, सड़क आदि की बेहतर सुविधाएं हों

- सिर्फ एमबीबीएस चिकित्सकों के आगे ही डाक्टर लगाया जाए, इसके लिए कानून बने
- सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों की साझेदारी हो, इसके एवज में उन्हें छूट मिले

- बोले चिकित्सक
चिकित्सा में सरकारी स्तर पर महज 20 फीसदी ही भागेदारी है, जबकि 80 फीसदी भागीदारी प्राइवेट अस्पतालों की होती है। मरीजों को मूलभूत सुविधाएं देने के लिए पब्लिक प्राइवेट सेक्टर की साझेदारी होनी चाहिए।  - डा. अशोक अग्रवाल , रेडियोलॉजिस्ट
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आर्मी की तरह वन रैंक वन पेंशन स्वास्थ्य सेवाओं में भी लागू हो। केंद्र सरकार के कर्मचारियों या चिकित्सकों की तरह राज्य सरकार के चिकित्सकों और प्रोफेसर को वेतन या अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए। सभी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलें, खासकर गर्भवती महिलाओं और बच्चों को।
 - डा. रश्मि शर्मा ,एनेस्थेटिस्ट

सभी पार्टियों के मेेनिफेस्टो में स्वास्थ्य सेवाओं का बात नहीं रहती है। हेल्थ सिस्टम को सुधारना चाहिए और यूके की तरह हेल्थ सिस्टम को लेवल में बांटा जाए तभी बेहतर इलाज मिल पाएगा और लेवल-4 पर एडवांस अस्पतालों का बोझ कम होगा।- डा. त्रिप्ता भगत , सर्जन

 क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट के नाम पर हर साल यूपी के चिकित्सकों का शोषण होता है जबकि अन्य राज्यों में पांच साल में एक बार क्लीनिक और अस्पतालों को रजिस्ट्रेशन होते हैं। यह बंद होना चाहिए।
 - डा. अपूर्व गोयल, सर्जन

लोकल एमपी और एमएलए कभी चिकित्सकों से बात तक नहीं करते। चिकित्सकों की मांग या मुद्दे उनके लिए मायने नहीं रखते। शहर में उच्च स्तर केचिकित्सक और चिकित्सा सुविधाएं हैं लेकिन इंफ्रास्टक्चर की कमी के चलते यहां कोई नहीं आना चाहता।
 - डा. अल्पना अग्रवाल , गाइनकोलोजिस्ट

चिकित्सकों की सुरक्षा हमारा मुख्य मुद्दा है। एक भी प्रत्याशी या पार्टी चिकित्सकों की सुरक्षा की बात नहीं करता और मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट को लागू करने का मुद्दा कभी विधानसभा में नहीं उठाता। डॉक्टर सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे तो बेहतर इलाज भी नहीं दे पाएंगे। - डा. राजीव गोयल, सर्जन, आईएमए अध्यक्ष

हेल्थ सेक्टर को एडिशनल सुविधाएं मिलनी चाहिए। गाजियाबाद के अस्पताल इंटरनेशनल लेवल के हैं और मेडिकल टूरिज्म के लिए इसको प्रमोट किया जा सकता है। इसके लिए विदेशी मरीजों को वीजा रिलेक्सेशन मिले। इसमें प्रत्याशियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
- डा. गौरव कौशिक, सर्जन

सरकार द्वारा हमेशा हेल्थ सेक्टर और एजुकेशन सेक्टर उपेक्षित होता है। पूरे बजट सिर्फ 2.8 फीसदी बजट ही हेल्थ सेक्टर को मिलता है। जबकि विदेशों में सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं देने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। यहां भी ऐसा होना चाहिए और सभी का हेल्थ इंश्योरेंस होना चाहिए।
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 - डा. आरकेपोद्दार , फिजिशियन

डाक्टर्स पर हमले और उनका शोषण के बाद भी चिकित्सकों की छवि निगेटिव बनाई जा रही है, जिसकी वजह से इस प्रोफेशन से युवाओं का मोह भंग होता जा रहा है। भविष्य में यह सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी। जब डॉक्टर्स नहीं होंगे तो जनता का इलाज कैसे होगा इस पर जनप्रतिनिधियों को ध्यान देना होगा।
 - डा. एचएचडी भारद्वाज , आईएमए सचिव
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